6 अक्टूबर को वसीयत लिखी, 7 को सुसाइड नोट…, IAS पत्नी ने किए 15 कॉल, बेटी को भी भेजा लेकिन…

हरियाणा के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार ने 7 अक्टूबर 2025 को चंडीगढ़ में अपने घर के बेसमेंट में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से करीब ढाई घंटे पहले उन्होंने अपनी आईएएस पत्नी को 15 बार कॉल किए, लेकिन वह फोन रिसीव नहीं कर पाईं क्योंकि वह जापान दौरे पर थीं।

उनकी पत्नी ने बाद में अपनी बेटी को फोन किया कि वह पिता से बात करें, लेकिन बेटी बाजार में थी। जब बेटी घर पहुंची तो उसने पिता का शव बेसमेंट में पाया। पूरन कुमार ने वसीयत भी लिखी थी जिसमें पूरी संपत्ति अपनी पत्नी के नाम करने का जिक्र था। इस वसीयत और सुसाइड नोट को उन्होंने पत्नी और दो आईपीएस अधिकारियों को भेजा था।
सुसाइड नोट में पूरन कुमार ने 15 सेवारत और पूर्व IAS-IPS अधिकारियों पर जाति-आधारित भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न, और सरकारी प्रणाली में सार्वजनिक अपमान जैसे आरोप लगाए हैं। उन्होंने उच्च अधिकारियों से अपनी शिकायतें की थीं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
मृत्यु के बाद उनकी आईएएस पत्नी अमनीत पी. कुमार ने अपने पति के उत्पीड़क आरोपियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और पोस्टमार्टम को रोकवा दिया। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से आरोपियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की गई है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और परिवार ने भी न्यायिक जांच की मांग की है।
इस पूरे घटनाक्रम में पूरन कुमार ने अपने करियर में लगे भेदभाव और उत्पीड़न की बातें सुसाइड नोट में विस्तार से लिखीं, जिससे यह मामला प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
संक्षेप में:
- पूरन कुमार ने 6 अक्टूबर को वसीयत लिखी और 7 अक्टूबर को सुसाइड नोट के साथ आत्महत्या की।
- पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार जापान दौरे पर थीं और उन्होंने पति को 15 कॉल करने के बावजूद फोन नहीं उठाया।
- पत्नी और बेटी के बीच बातचीत हुई, बेटी ने घर जाकर शव देखा।
- सुसाइड नोट में 15 अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे।
- पत्नी ने पोस्टमार्टम रोका और दोषियों की जवाबदेही की मांग की।
- मामला अभी जांचाधीन और राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर चर्चा में है।
यह पूरी जानकारी खबरों से मिली है जो 7 से 9 अक्टूबर 2025 के पर्यंत सामने आई है।
पोस्टमार्टम रोकने के कानूनी निहितार्थ इस प्रकार हैं:
- पोस्टमार्टम अनिवार्य होता है जब मृत्यु अप्राकृतिक, संदिग्ध या हिंसात्मक हो। ऐसी स्थिति में पुलिस और न्यायालय की अनुमति से ही पोस्टमार्टम प्रक्रिया हो सकती है। किसी भी व्यक्ति या परिवार को बिना कानूनी आदेश के पोस्टमार्टम रोकने का अधिकार नहीं होता है।
- कानून के तहत, पोस्टमार्टम रिपोर्ट जांच और न्यायिक कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य होती है। इसे रोकने या बाधित करने पर अपराध की संदेह पैदा हो सकती है और कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
- परिवार के सदस्य पोस्टमार्टम के दौरान किसी चिकित्सक या अधिकारी का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन वे पोस्टमार्टम पूरी तरह से रोक नहीं सकते।
- पोस्टमार्टम को लेकर नियम और प्रोटोकॉल पुराने ब्रिटिश समय से ही चले आ रहे हैं, जैसे सूर्य की रोशनी में पोस्टमार्टम करना, पर आधुनिक तकनीक की वजह से इन नियमों में बदलाव की मांग हो रही है।
- यदि कोई पोस्टमार्टम रोकता है, तो यह न्यायालय या पुलिस के आदेश के खिलाफ माना जाएगा और इस पर कानूनी कार्रवाई संभव है क्योंकि पोस्टमार्टम का उद्देश्य मृत्यु के कारण और अपराध मामले में न्याय सुनिश्चित करना होता है।
संक्षेप में, पोस्टमार्टम रोकना कानूनी रूप से सरल नहीं होता और इसे केवल न्यायालयीय या पुलिस आदेश के तहत ही किया जा सकता है, अन्यथा यह अवैध माना जाता है और इससे जांच बाधित हो सकती है।

