ज्ञानपीठ सम्मानित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन, 88 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

हिंदी साहित्य जगत के वरिष्ठ कवि और लेखक, तथा वर्ष 2024 के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार शाम रायपुर में निधन हो गया। वे 88 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनका इलाज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), रायपुर में चल रहा था।

AIIMS प्रशासन के अनुसार, विनोद कुमार शुक्ल ने शाम 4:58 बजे अंतिम सांस ली। डॉक्टरों ने बताया कि वे गंभीर फेफड़ों की बीमारी, निमोनिया और मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर से जूझ रहे थे। इसके अलावा उन्हें डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी थीं।
प्रधानमंत्री और नेताओं ने जताया शोक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके शब्दों और रचनाओं ने भारतीय साहित्य को नई संवेदनशीलता दी।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने साधारण जीवन को असाधारण साहित्य में ढाल दिया। उन्होंने घोषणा की कि लेखक का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी उनके निधन को प्रदेश के लिए बड़ी क्षति बताया और कुछ दिनों के राज्य शोक की मांग की।
साहित्यिक यात्रा और योगदान
विनोद कुमार शुक्ल का जन्म वर्ष 1937 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में हुआ था। उनकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत 1971 में कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ से हुई। इसके बाद उन्होंने कई चर्चित काव्य संग्रह और उपन्यास लिखे।उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘कविता से लंबी कविता’ शामिल हैं। ‘नौकर की कमीज’ पर फिल्म भी बनाई गई, जिसने उनकी रचनात्मक सोच को व्यापक पहचान दिलाई।
पहले छत्तीसगढ़ी लेखक जिन्हें मिला ज्ञानपीठ
विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ से ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले पहले लेखक थे। इससे पहले उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके थे। उनकी लेखनी की खासियत सादगी, गहरी संवेदना और आम आदमी के जीवन को केंद्र में रखना रही।
साहित्य जगत में शोक की लहर
उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर है। लेखक, पाठक और साहित्य प्रेमी उन्हें एक ऐसे रचनाकार के रूप में याद कर रहे हैं, जिन्होंने बिना शोर किए गहरी बात कहने की कला सिखाई।विनोद कुमार शुक्ल भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को लगातार प्रेरित करती रहेंगी।

