उत्तर प्रदेश के संभल जिले से पुलिस तंत्र को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर लूट का मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने बड़ी लापरवाही और कथित साजिश का नमूना पेश किया, जो लूट के वक्त जेल के अंदर बंद था। अदालत ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कोतवाल समेत 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिए हैं।

जेल में बंद आरोपी, फिर भी लूट का केस

पूरा मामला संभल जिले के एक थाना क्षेत्र का है, जहां कुछ महीने पहले एक लूट की घटना दर्ज की गई थी। पुलिस ने तत्काल कार्रवाई दिखाने के लिए कुछ लोगों को लूट के आरोप में नामजद किया, जिनमें एक व्यक्ति वह भी था जो उस समय जेल में न्यायिक हिरासत में था।
जांच के दौरान यह बात स्पष्ट हुई कि आरोपी बताए गए व्यक्ति की जेल में मौजूदगी की आधिकारिक पुष्टि जेल रिकॉर्ड से हुई। इस खुलासे के बाद मामला पूरी तरह पलट गया और पुलिस की संदेहास्पद कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।

कोर्ट ने लिया संज्ञान, दिया कार्रवाई का आदेश

घटना की शिकायत आरोपी व्यक्ति के परिवार ने अदालत में की। मामले की सुनवाई के दौरान जब जेल रिकॉर्ड पेश किया गया, तो अदालत ने पुलिस की जांच पर असंतोष जताया और इसे गंभीर मामला मानते हुए कोतवाल समेत 12 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने के आदेश जारी किए। अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस ने जानबूझकर गलत व्यक्ति को फंसाने की कोशिश की है।

फर्जी एनकाउंटर और फर्जीवाड़े के आरोप भी सामने

इस केस से जुड़ी जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित पुलिस टीम पहले भी एक फर्जी एनकाउंटर में शामिल रही है। दावा किया जा रहा है कि पुलिस ने ‘क्राइम कंट्रोल’ के नाम पर कई बार झूठी मुठभेड़ों को ‘सफल ऑपरेशन’ के रूप में पेश किया। इस मामले में भी एक समान पैटर्न देखने को मिल रहा है — पहले अपराध दिखाना, फिर निर्दोष को आरोपी बनाना।

वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपी गई रिपोर्ट

अदालत के आदेश के बाद पुलिस प्रशासन ने तत्काल रिपोर्ट तैयार कर वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपी है। संभल के पुलिस अधीक्षक (SP) ने कहा है कि “मामले की जांच निष्पक्ष रूप से की जाएगी। यदि कोई पुलिसकर्मी दोषी पाया गया, तो सख्त कार्रवाई से कोई परहेज़ नहीं किया जाएगा।”
सूत्रों के मुताबिक, मामले को लेकर जिलाधिकारी और डीआईजी स्तर तक रिपोर्ट पहुंच चुकी है।

स्थानीय जनता में रोष, पुलिस पर अविश्वास बढ़ा

इस घटनाक्रम के बाद संभल क्षेत्र में जनता का गुस्सा उबाल पर है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर जेल में बंद व्यक्ति पर भी लूट का केस बन सकता है, तो आम आदमी की सुरक्षा और न्याय पर सवाल खड़ा होता है। कई सामाजिक संगठनों और वकीलों ने इस मामले को मानवाधिकार का उल्लंघन बताया है और CBI जांच या एसआईटी गठन की मांग उठाई है।

पुलिस सिस्टम पर उठे सवाल

यह मामला केवल एक जांच तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि पूरा पुलिस व्यवस्था अब संदेह के घेरे में है। कई रिटायर्ड अफसरों ने माना है कि निचले स्तर पर अक्सर ‘रिजल्ट दिखाने की जल्दबाजी’ में अधिकारी ऐसे झूठे केस तैयार कर देते हैं जो बाद में विभाग के लिए कलंक बन जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटना ने पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

आगे क्या होगा?

अदालत के आदेश के बाद अब संबंधित पुलिसकर्मियों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विभागीय जांच भी समानांतर रूप से चलेगी। न्यायिक स्तर पर यह केस अब कानूनी मिसाल बन सकता है, क्योंकि इसमें पुलिस द्वारा साक्ष्य छिपाने और झूठा केस दर्ज करने जैसे गंभीर आरोप जुड़े हैं।

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