गाजियाबाद के हरीश राणा 12 साल से कोमा में हैं, और उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में 13 जनवरी को अंतिम सुनवाई करेगा, जहां परिवार से सीधे बातचीत के बाद फैसला लिया जाएगा। यह केस न केवल चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं को उजागर करता है, बल्कि जिंदगी-मौत के नैतिक सवालों पर भी बहस छेड़ रहा है।​

हरीश राणा का दर्दनाक हादसा: कैसे शुरू हुई यह जिंदगी-भर की कैद

2013 में चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हरीश राणा अपने पीजी हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर पड़े थे। यह हादसा उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल गया। तब 22 साल के हरीश को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन गंभीर चोटों के कारण वे कोमा में चले गए। आज 13 साल बाद भी उनकी हालत वही है – न बोल पाते हैं, न हिल पाते हैं।​

मेडिकल जांचों में पाया गया कि हरीश की मस्तिष्क क्षति गंभीर है। एम्स की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं। उनके शरीर पर बेडसोर के गहरे घाव हैं, जो लगातार दर्द पैदा कर रहे हैं। परिवार बताता है कि हरीश की आंखें खुली रहती हैं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। यह स्थिति पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) जैसी है, जहां व्यक्ति जीवित तो होता है, लेकिन चेतना खो चुका होता है।​

गाजियाबाद के इस युवक की कहानी हर उस परिवार के दर्द को बयां करती है, जो लाइलाज बीमारियों से जूझ रहा है। हरीश के पिता अशोक राणा ने बताया कि हादसे के बाद वे चंडीगढ़ से गाजियाबाद लौटे, लेकिन बेटे का इलाज जारी रखा।

परिवार का अथाह बलिदान: घर बेचा, नौकरी छोड़ी, मजदूरी की

हरीश के इलाज ने पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। पिता अशोक राणा ने घर बेच दिया, नौकरी छोड़ दी और गुजारे के लिए मजदूरी शुरू कर दी। मां और पिता दोनों अब बेटे की देखभाल में जुटे हैं। वे कहते हैं, “हमारा बेटा सांस तो ले रहा है, लेकिन जिंदगी नहीं जी रहा। यह पीड़ा हमें भी मार रही है।”​

यह परिवार की दूसरी अपील है सुप्रीम कोर्ट में। पहली बार उन्होंने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने और मेडिकल रिपोर्ट्स मांगीं। नोएडा जिला अस्पताल की रिपोर्ट ने भी हरीश की खराब हालत की पुष्टि की। परिवार का तर्क है कि लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ। अब वे चाहते हैं कि बेटे को इस ‘सांसों की कैद’ से मुक्ति मिले।​

भारत में ऐसे कई केस हैं जहां परिवार लंबे समय तक जूझते हैं। हरीश का मामला Common Cause vs Union of India (2018) जुदgment से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट की संवेदनशील सुनवाई: ‘इस हालत में बच्चे को नहीं रख सकते’

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने एम्स की रिपोर्ट पढ़कर दुख जताया। कोर्ट ने कहा, “हम इस बच्चे को इस हालत में नहीं रख सकते। यह दुखद है।” बेंच ने माता-पिता से मिलने का फैसला किया और 13 जनवरी को अंतिम सुनवाई निर्धारित की।​

कोर्ट ने साफ कहा कि मामला संवेदनशील है। वे मेडिकल बोर्ड की राय पर फैसला लेंगे। निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए सख्त गाइडलाइंस हैं – लिविंग विल, मेडिकल सर्टिफिकेट और कोर्ट की मंजूरी जरूरी। हरीश केस में परिवार की अपील पर कोर्ट ने सभी दस्तावेज जांचे।
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यह सुनवाई 17 दिसंबर 2025 को शुरू हुई थी। कोर्ट ने परिवार को आश्वासन दिया कि जल्द फैसला होगा।​

निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है? भारत में कानूनी स्थिति

निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) वह प्रक्रिया है जिसमें जीवन रक्षक मशीनें हटा दी जाती हैं या दवाओं को रोक दिया जाता है, ताकि मरीज प्राक्रियिक मौत मर सके। भारत में 2018 के Common Cause केस में सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध घोषित किया।​

इसके लिए ‘लिविंग विल’ जरूरी है, जो व्यक्ति पहले ही बना ले। लेकिन कोमा में मरीज के लिए परिवार की सहमति पर कोर्ट फैसला लेता है। सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) अभी भारत में गैरकानूनी है।

हरीश केस में सवाल उठ रहा है – क्या 12 साल की कोमा को जीवन माना जाए? विशेषज्ञों का कहना है कि PVS में मरीज की गुणवत्ता जीवन शून्य होती है।

गाजियाबाद से चंडीगढ़: हरीश की पढ़ाई और हादसे की पूरी टाइमलाइन

  • 2013: हरीश चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग कर रहे थे। पीजी हॉस्टल से गिरे।
  • 2013-2025: लगातार कोमा, कई अस्पतालों में इलाज।
  • 2025: परिवार ने पहली बार सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
  • 17 दिसंबर 2025: कोर्ट ने एम्स रिपोर्ट मांगी।
  • 13 जनवरी 2026: अंतिम सुनवाई।​

यह टाइमलाइन दिखाती है कि परिवार ने हार नहीं मानी। लेकिन अब वे थक चुके हैं।

समाज और नैतिकता का सवाल: जिंदगी बचाएं या पीड़ा खत्म करें?

हरीश का केस समाज को आईना दिखाता है। क्या आधुनिक चिकित्सा जिंदगी बढ़ा रही है या सजा दे रही है? धार्मिक मान्यताओं में जीवन ईश्वरीय है, लेकिन पीड़ा को कैसे नजरअंदाज करें?

विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में ऐसे हजारों मरीज हैं। संसाधनों की कमी से परिवार टूट जाते हैं। सरकार को PVS पेशेंट्स के लिए नीति बनानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले: क्या उम्मीद?

  • अरुणा शानबाग केस (2011): निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर पहली बहस।
  • Common Cause (2018): लिविंग विल वैध।
  • पी. वेंकटेश्वरulu (2023): परिवार की अपील खारिज।

हरीश केस में कोर्ट संवेदनशील रुख अपना रहा है। फैसला मिसाल बनेगा।

परिवार की अपील: ‘बेटे को मुक्ति दो’

अशोक राणा कहते हैं, “हमने सब कुछ किया। अब बेटे को सुकून चाहिए।” मां रोते हुए कहती हैं, “यह जिंदगी नहीं, सजा है।” गाजियाबाद में पड़ोसी भी उनका साथ दे रहे।​

आगे क्या? 13 जनवरी का इंतजार

सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरीश के भविष्य को तय करेगा। अगर मंजूरी मिली, तो यह भारत का एक और बड़ा केस होगा। परिवार को न्याय मिले, यही प्रार्थना है।
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