गाजियाबाद के हरीश राणा का 21 सेंकड का आखिरी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसमें उनकी डबडबाती आंखें, कुछ कहने की बेबस कोशिश और माथे पर चंदन का तिलक लोगों की आंखें नम कर रहा है। 13 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से इच्छामृत्यु की दिशा में बढ़ते इस मामले ने पूरे देश को रुला दिया है। यह वीडियो न सिर्फ हरीश के दर्द को बयां करता है, बल्कि उनके परिवार के अथाह त्याग की भी मार्मिक कहानी पेश करता है।

हरीश राणा का दर्दभरा सफर: 13 साल की कोमा की जंग

हरीश राणा, गाजियाबाद के एक सामान्य परिवार के बेटे थे, जिनकी जिंदगी 2013 में एक हादसे ने हमेशा के लिए बदल दी। चौथी मंजिल से गिरने के बाद वे कोमा में चले गए और वेंटिलेटर पर ही उनकी सांसें चल रही थीं। माता-पिता अशोक राणा और निर्मला ने 13 साल तक उनकी देखभाल की, बिना एक पल की शिकायत के। परिवार ने हर संभव इलाज कराया, लेकिन हालत में कोई सुधार न होने पर इच्छामृत्यु का फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाजत दी और उन्हें दिल्ली के एम्स hospitल शिफ्ट किया गया।

इस लंबे संघर्ष ने हरीश के परिवार को आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया। रोजाना नर्सिंग होम का खर्च, दवाइयां और मेडिकल सुविधाओं ने उनके घर की जमा-पूंजी खत्म कर दी। फिर भी माता-पिता ने हार नहीं मानी। अशोक राणा ने बताया कि हरीश कभी-कभी आंखें खोलते और कुछ कहने की कोशिश करते, लेकिन आवाज न निकल पाती। यह देखकर उनका दिल टूट जाता।

21 सेंकड का वायरल वीडियो: भावुक विदाई का पल

21 सेंकड के इस वीडियो में हरीश बिस्तर पर लेटे हैं, उनकी आंखें डबडबा रही हैं। ब्रह्माकुमारी बहनें उनके माथे पर चंदन का तिलक लगाती हैं और प्रार्थना करती हैं, “सबको माफ करते हुए जाओ, सबसे माफी मांगते हुए जाओ।” हरीश की आंखें बार-बार पलक झपकती हैं, मानो वे कुछ कहना चाह रहे हों। कमरे में सन्नाटा पसरा है, सिर्फ प्रार्थना की आवाज गूंज रही है। यह वीडियो यूट्यूब और सोशल मीडिया पर लाखों बार देखा जा चुका है।

यह वीडियो हरीश को दुनिया से विदाई का आखिरी पल कैद करता है। परिवार ने इसे शेयर किया ताकि लोग उनके दर्द को समझें। कई लोग इसे भारत का पहला निष्क्रिय इच्छामृत्यु केस मान रहे हैं, जहां मरीज की कोई सक्रिय इच्छा नहीं थी। वीडियो की हर फ्रेम में हरीश का दर्द झलकता है, जो देखने वालों को रुला देता है।

गाजियाबाद में 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को अंतिम विदाई का ये क्षण है !!

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: इच्छामृत्यु को हरी झंडी

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब मरीज की हालत निष्क्रिय कोमा में हो और रिकवरी की कोई गुंजाइश न हो, तो इच्छामृत्यु की अनुमति दी जा सकती है। जस्टिस की बेंच ने परिवार की याचिका पर तीन दिन में फैसला दिया। इसके बाद हरीश को एम्स दिल्ली ले जाया गया, जहां डॉक्टर लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया शुरू करेंगे।

यह फैसला भारत में इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस छेड़ रहा है। पहले अरुणा शानबाग केस में पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी मिली थी, लेकिन हरीश का केस और स्पष्ट उदाहरण है। मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे मामलों में परिवार का मानसिक बोझ कम करने के लिए कानूनी प्रावधान जरूरी हैं।

परिवार का त्याग: माता-पिता की बेबसी की कहानी

हरीश के पिता अशोक राणा ने 13 साल तक नौकरी छोड़कर बेटे की सेवा की। मां निर्मला ने घर का हर काम संभाला और हरीश की देखभाल की। भाई-बहनों ने भी कमर कसी। परिवार ने बताया कि हरीश कभी-कभी आंखें खोलकर देखते, लेकिन बोल नहीं पाते। वीडियो में माता-पिता की नम आंखें उनके बलिदान को बयां करती हैं।

परिवार ने कहा, “हमने बहुत कोशिश की, लेकिन अब भगवान पर छोड़ रहे हैं।” यह कहानी हर भारतीय परिवार के लिए प्रेरणा है, जो बीमारी से जूझ रहा है। सोशल मीडिया पर लोग परिवार के हौसले की तारीफ कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर धूम: वायरल वीडियो की प्रतिक्रियाएं

हरीश राणा का वीडियो यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर वायरल है। लोग कमेंट्स में लिख रहे हैं, “आंखें नम हो गईं”, “परिवार को सलाम”, “इच्छामृत्यु का सही फैसला”। आज तक, एनडीटीवी और नवभारत टाइम्स जैसे चैनलों ने इसे प्रमुखता से दिखाया। वीडियो को लाखों व्यूज मिल चुके हैं।

कई यूजर्स ने इसे इमोशनल विदाई बताया। एक यूजर ने लिखा, “हरीश की आंखें सब कुछ कह रही हैं।” यह वीडियो न सिर्फ वायरल है, बल्कि इच्छामृत्यु बहस को तेज कर रहा है।

इच्छामृत्यु क्या है? भारत में कानूनी स्थिति

इच्छामृत्यु दो प्रकार की होती है- एक्टिव और पैसिव। एक्टिव में दवा देकर मौत दी जाती है, जो भारत में गैरकानूनी है। पैसिव में लाइफ सपोर्ट हटाया जाता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर किया है। हरीश का केस पैसिव इच्छामृत्यु का उदाहरण है।

भारत में 2011 के अरुणा शानबाग केस से पैसिव यूथेनेशिया की शुरुआत हुई। हरीश केस ने इसे और मजबूत किया। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मरीजों के लिए गाइडलाइंस सख्त होनी चाहिए।

गाजियाबाद से दिल्ली एम्स: आखिरी सफर

हरीश को गाजियाबाद के नर्सिंग होम से एम्स दिल्ली लाया गया। एम्बुलेंस में परिवार साथ था। वहां डॉक्टरों ने चेकअप के बाद लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू की। परिवार ने कहा कि यह उनका आखिरी फैसला है।

एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि प्रक्रिया धीरे-धीरे होगी ताकि दर्द न हो। यह सफर हरीश के लिए अंतिम था, लेकिन परिवार के लिए नई शुरुआत।

समाज में संदेश: जीवन और मृत्यु की सीमा

हरीश राणा का केस जीवन के मूल्य पर सवाल उठाता है। कब तक वेंटिलेटर पर जीना सही है? परिवार का बोझ कब तक? यह बहस जरूरी है। सरकार को इच्छामृत्यु के लिए स्पष्ट कानून बनाना चाहिए।

लोगों का कहना है कि हरीश की कहानी से सीख मिलती है- समय रहते फैसले लें। परिवार को दान देकर मदद करें।

वीडियो के मुख्य पल: फ्रेम बाय फ्रेम विश्लेषण

  • 0-5 सेंकड: हरीश की आंखें खुलती हैं, डबडबाती नजर आती हैं।

  • 6-10 सेंकड: चंदन का तिलक लगाया जाता है।

  • 11-15 सेंकड: प्रार्थना शुरू, “माफ करते हुए जाओ”।

  • 16-21 सेंकड: आंखें झपकती हैं, भावुक सन्नाटा।

यह वीडियो भावनाओं का रोलरकोस्टर है।

परिवार को मिल रहा समर्थन

सोशल मीडिया पर लोग परिवार के लिए दुआएं मांग रहे। कुछ ने फंडरेजर शुरू किया। गाजियाबाद में स्थानीय नेता पहुंचे। यह एकजुटता सराहनीय है।

एक यादगार विदाई

हरीश राणा का 21 सेंकड वीडियो अमर हो गया। यह दर्द, त्याग और इंसानियत की कहानी है। उनके परिवार को हिम्मत मिले।

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