रंगों और उल्लास का पर्व होली इस वर्ष ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद खास और कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में मनाया जाएगा। फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व 2 और 3 मार्च को पूरे देश में श्रद्धा, परंपरा और सावधानी के साथ मनाया जाएगा।

इस बार होलिका दहन के समय को लेकर भद्रा का साया रहेगा, वहीं धुलंडी के दिन चंद्र ग्रहण की उपस्थिति ने लोगों की जिज्ञासा और सतर्कता दोनों बढ़ा दी है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 2 मार्च सोमवार को होलिका दहन होगा और 3 मार्च मंगलवार को रंगों की होली यानी धुलंडी खेली जाएगी। हालांकि इस बार होलिका दहन के लिए समय बेहद सीमित रहेगा, जिससे परंपराओं का पालन करने वालों को विशेष सावधानी बरतनी होगी।

होली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह अधर्म पर धर्म की विजय, अहंकार के अंत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक है। होलिका दहन की परंपरा प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा से जुड़ी है, जहां भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा हुई और अहंकारी होलिका का अंत हुआ।

धुलंडी के दिन लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर आपसी द्वेष भूलते हैं और सामाजिक सौहार्द का संदेश देते हैं। यही कारण है कि होली को सामाजिक समरसता का पर्व भी कहा जाता है।

इस वर्ष होली क्यों है खास?

साल 2026 की होली कई कारणों से विशेष मानी जा रही है:

  1. होलिका दहन के समय भद्रा का प्रभाव
  2. धुलंडी के दिन चंद्र ग्रहण
  3. होलिका दहन के लिए बहुत सीमित मुहूर्त
  4. ग्रह-नक्षत्रों की दुर्लभ स्थिति

इन सभी कारणों ने इस वर्ष के होली पर्व को ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।

होलिका दहन: भद्रा ने सीमित किया शुभ समय

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 2 मार्च को शाम 5:56 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी, जो अगले दिन 3 मार्च को शाम 5:07 बजे तक रहेगी। लेकिन इस दौरान भद्रा का प्रभाव होने के कारण होलिका दहन सामान्य समय पर नहीं किया जा सकेगा।

शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि भद्रा काल में होलिका दहन करना अशुभ माना जाता है। केवल भद्रा के पुच्छ काल या भद्रा समाप्त होने के बाद ही दहन करना शास्त्रसम्मत होता है।

सिर्फ 12 मिनट का दुर्लभ मुहूर्त

जयपुर सहित कई क्षेत्रों में ज्योतिषाचार्यों ने बताया है कि 2 मार्च को शाम 6:24 बजे से 6:36 बजे तक मात्र 12 मिनट का समय ऐसा रहेगा, जब होलिका दहन करना श्रेष्ठ माना जाएगा।

यह स्थिति अत्यंत दुर्लभ है, जब इतने बड़े पर्व के लिए इतना कम समय उपलब्ध हो। इसी कारण लोगों से आग्रह किया गया है कि वे पहले से सभी तैयारियां पूरी रखें, ताकि निर्धारित मुहूर्त में विधिवत होलिका दहन किया जा सके।

अर्द्धरात्रि का विकल्प भी मौजूद

कुछ विद्वान ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यदि भद्रा अर्द्धरात्रि तक बनी रहती है और ऊषा काल तक पहुंचती है, तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन किया जा सकता है।

इस गणना के अनुसार, 2 मार्च की रात 1:26 बजे से 2:38 बजे तक का समय भी होलिका दहन के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। ग्रामीण और परंपरागत समाजों में कई स्थानों पर इसी अर्द्धरात्रि मुहूर्त को अपनाया जाता है।

धुलंडी के दिन चंद्र ग्रहण

इस वर्ष की होली को और अधिक विशेष बनाता है 3 मार्च को लगने वाला चंद्र ग्रहण। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह ग्रहण दोपहर 3:20 बजे शुरू होगा और शाम 6:48 बजे समाप्त होगा।

जयपुर जैसे क्षेत्रों में चंद्र उदय शाम 6:29 बजे होगा, जिससे ग्रहण का प्रभाव केवल 18 मिनट तक ही रहेगा। चूंकि यह ग्रहण उदयकालीन है, इसलिए इसका प्रभाव सीमित माना जा रहा है।

ग्रहण का सूतक और धार्मिक मान्यताएं

चंद्र ग्रहण का सूतक काल सुबह 6:20 बजे से लागू होगा। सूतक काल में मंदिरों के कपाट बंद रखना, पूजा-पाठ से परहेज और सात्विक आचरण का पालन करना शास्त्रों में बताया गया है।

हालांकि ज्योतिषाचार्यों ने स्पष्ट किया है कि धुलंडी पर चंद्र ग्रहण का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि ग्रहण का समय बहुत कम है और रंग खेलने की परंपरा सूर्योदय के बाद शुरू हो जाती है।

क्या धुलंडी मनाना रहेगा सुरक्षित?

ज्योतिषाचार्य एकमत हैं कि 3 मार्च को सूर्योदय के बाद धुलंडी मनाने में कोई बाधा नहीं है। ग्रहण दोपहर बाद शुरू होगा, जबकि रंग खेलने का मुख्य समय सुबह और दोपहर तक ही रहता है।

इसलिए आम जनता को घबराने की आवश्यकता नहीं है। केवल ग्रहण काल के दौरान धार्मिक क्रियाओं से बचना पर्याप्त रहेगा।

ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति

इस बार चंद्र ग्रहण पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि में घटित होगा। यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा, लेकिन इसका धार्मिक और सामाजिक प्रभाव सीमित माना जा रहा है।

ज्योतिषीय दृष्टि से यह ग्रहण कुछ राशियों के लिए आत्ममंथन और संयम का संकेत देता है, लेकिन होली जैसे सामूहिक पर्व पर इसका कोई प्रतिकूल असर नहीं बताया गया है।

प्रशासन और समाज की तैयारियां

सीमित मुहूर्त और विशेष परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कई स्थानों पर सामूहिक होलिका दहन की व्यवस्था की जा रही है, ताकि सभी लोग निर्धारित समय में विधि-विधान से पर्व मना सकें।

साथ ही, लोगों से अपील की जा रही है कि वे पर्यावरण-अनुकूल होली, सूखे रंगों और सुरक्षित तरीके से पर्व मनाएं।

होली का सामाजिक संदेश

होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें सिखाता है कि रंगों की तरह जीवन भी विविधताओं से भरा है और इन्हें अपनाकर ही समाज को सुंदर बनाया जा सकता है।

इस वर्ष की विशेष परिस्थितियां यह भी संदेश देती हैं कि परंपरा और विज्ञान — दोनों के बीच संतुलन बनाकर ही पर्वों का वास्तविक आनंद लिया जा सकता है।

साल 2026 की होली कई मायनों में यादगार रहने वाली है। 2 मार्च को सीमित समय में होलिका दहन, 3 मार्च को धुलंडी और उसी दिन चंद्र ग्रहण — ये सभी तत्व इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं।

ज्योतिषाचार्यों की सलाह और परंपराओं का पालन करते हुए यदि लोग होली मनाते हैं, तो यह पर्व न केवल रंगों से, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और उल्लास से भी भरपूर रहेगा।

अंततः होली का उद्देश्य यही है — बुराई का अंत, अच्छाई की जीत और जीवन में रंगों की वापसी
  यह भी पढ़ें:

https://thedbnews.in/wp-content/uploads/2026/01/holi_2_march_daily-0001.jpghttps://thedbnews.in/wp-content/uploads/2026/01/holi_2_march_daily-0001-150x150.jpgAyushi Rawatराय / संपादकीयराष्ट्रीय समाचारलाइफस्टाइलस्थानीय / राज्य समाचारBreaking News,Breaking News in Hindi,Breaking News Live,Dhulandi,HIndi News,Hindi News Live,Holi,Holi 2026,Holi kab hai,Latest News in Hindi,News in Hindi,The DB News,चंद्र ग्रहण,ताज़ा हिंदी समाचार,धुलंडी,भद्रा काल,हिंदी समाचार,होली,होली 2026,होली कब है।,होली के मुहूर्तरंगों और उल्लास का पर्व होली इस वर्ष ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद खास और कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में मनाया जाएगा। फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व 2 और 3 मार्च को पूरे देश में श्रद्धा, परंपरा और सावधानी के साथ मनाया जाएगा। इस...For Daily Quick Briefing