प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में एक प्रवचन में बताया कि व्यापार में लिया गया उधार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी होता है । वे कहते हैं कि कर्ज या उधारी का हिसाब-किताब केवल पैसे का लेन-देन नहीं, बल्कि कर्म बंधन का विषय है। यदि कोई व्यक्ति जीवनकाल में अपना बकाया नहीं चुकाता, तो यह ऋण अगले जन्म तक पीछा कर सकता है, और तब आत्मा को पुनः जन्म लेकर उस देनदारी का निपटारा करना पड़ता है ।

महाराज जी के अनुसार,

  • अगर आपने किसी से उधारी ली है, तो उसे समय पर लौटाना आपका कर्तव्य है।
  • वह समझाते हैं – “दो दिन भूखे रह लो, लेकिन कर्ज चुका दो”, क्योंकि यह कर्म का लेखा-जोखा है। जब लिया है, तो लौटाना ही होगा, अन्यथा अगले जन्म में उसे चुकाने के लिए फिर जन्म लेना पड़ सकता है ।​
  • उन्होंने चेतावनी दी कि कर्ज लेकर सुख-सुविधाएं भोगना उचित नहीं, क्योंकि ऋण और पाप दोनों ब्याज की तरह बढ़ते हैं ।

महाराज जी ने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों, विशेषकर संतान का भी यह धर्म है कि वे माता-पिता के अधूरे कार्यों, विशेषकर ऋणों का भुगतान करें, जिससे आत्मा को मुक्ति मिल सके ।
उनका संदेश स्पष्ट है — आर्थिक ईमानदारी और कर्म का संतुलन ही सच्ची आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग है।

प्रेमानंद महाराज ने उधार और कर्म पर क्या कहा

प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचनों में उधार और कर्म को जीवन के गहरे आध्यात्मिक सिद्धांतों से जोड़ा है। वे बताते हैं कि उधार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कर्म से जुड़ा हुआ विषय है—और इसका फल आत्मा को कई जन्मों तक भोगना पड़ सकता है ।

उधार यानी कर्म का बंधन

महाराज जी ने कहा कि जिसने किसी से उधारी ली है, उसे हर स्थिति में लौटाना चाहिए। कर्ज चुकाना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है। अगर कोई व्यक्ति जीवन में उधार चुकाए बिना चला जाता है, तो आत्मा को अगले जन्म में उस ऋण का हिसाब पूरा करना पड़ सकता है । वे चेतावनी देते हैं कि “कर्ज लेकर सुख-सुविधाएं भोगना समझदारी नहीं है। कर्ज और पाप दोनों ही ब्याज की तरह बढ़ते हैं।”

कर्म से कोई मुक्त नहीं

प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि कर्म किसी को माफ नहीं करता—जो जैसा करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है । उनके अनुसार, जब मनुष्य गलत लेन-देन करता है या दूसरों का धन दबाता है, तो उसका परिणाम आने वाले जन्मों में भुगतना पड़ता है। वे इसे “ऋणानुबंध” यानी पिछले जन्मों के लेन-देन से जुड़ा संबंध बताते हैं ।​

सच्चे कर्म और धर्म का संबंध

महाराज जी के अनुसार, वही कर्म श्रेष्ठ है जो धर्म से युक्त हो। यदि कोई कर्म धर्म से रहित है, तो वह कुकर्म कहलाता है । इसलिए, व्यक्ति को चाहिए कि हर कार्य ईमानदारी, सत्य और सेवा भाव से करे, जिससे उसके कर्मों का फल भी शुभ हो।

मुक्ति का मार्ग

उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी के पिछले कर्म या कर्ज भारी हैं, तो भगवान के नाम-जप और भक्ति से उनका प्रभाव कम किया जा सकता है। राधे-नाम के जप से आत्मा को जन्म-जन्म के ऋणों से मुक्ति मिल सकती है ।

संक्षेप में, प्रेमानंद महाराज का संदेश यह है कि उधार चुकाना और धर्मयुक्त कर्म करना आत्मा की मुक्ति का मार्ग है—क्योंकि “कर्म चाहे छोटा हो या बड़ा, उसका फल निश्चित है।”

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