मोहन भागवत ने भोपाल में कहा: लव जिहाद रोकने की शुरुआत घर-परिवार से होनी चाहिए।

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में समाज के सामने उपस्थित सामाजिक चुनौतियों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि “लव जिहाद” जैसी प्रवृत्तियों को रोकने की शुरुआत घर और परिवार से करनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि परिवार अपने बच्चों के बीच नियमित संवाद और संस्कारों को बनाए रखे, तो उन्हें किसी बाहरी बहकावे में आने से बचाया जा सकता है।

भागवत ने कहा कि आज के समय में परिवारों के बीच संवाद की कमी सबसे बड़ी समस्या बन गई है। बच्चों और माता-पिता के बीच दूरी बढ़ने से वे बाहरी प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवार ही समाज की सबसे मजबूत इकाई है, और जब परिवार मजबूत होगा, तो समाज अपने आप सुरक्षित रहेगा।
संवाद और परिवारिक मूल्यों की भूमिका
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि भारत जैसे देश में परिवार हमेशा से संस्कृति, परंपरा और नैतिक मूल्यों का केंद्र रहा है। लेकिन तेज़ी से बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया और वैश्विक प्रभावों के कारण पारिवारिक संवाद कमजोर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि “यदि माता-पिता अपने बच्चों से नियमित बातचीत करें, उन्हें धर्म, संस्कृति और परंपराओं के बारे में समझाएं, तो इससे उनमें आंतरिक मजबूती आती है।”
भागवत ने सुझाव दिया कि माता-पिता को केवल अपने बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धियों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें भारतीय सभ्यता और मूल्यों के बारे में भी जागरूक बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “जहां संस्कारों की नींव मजबूत होती है, वहां बाहरी प्रलोभन या धोखे का असर नहीं होता।”
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समाज में बढ़ती चुनौतियां और लव जिहाद का संदर्भ
कार्यक्रम के दौरान भागवत ने “लव जिहाद” के मुद्दे को सामाजिक समस्या के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इसे केवल वैधानिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चुनौती भी है। उन्होंने कहा कि “यदि परिवार और समाज सजग रहेंगे, तो कोई भी व्यक्ति या संगठन युवतियों को बहकाने में सफल नहीं होगा।”
भागवत के अनुसार, आज का युवा वर्ग इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में कई प्रभावित विचारधाराओं के संपर्क में है। ऐसे में परिवार का दायित्व बनता है कि वह अपने बच्चों को इस दिशा में सजग करे। उन्होंने कहा कि परिवर्तन के लिए सबसे पहले घर की चारदीवारी में सुधार की आवश्यकता है।
संस्कार और शिक्षा का संयोजन जरूरी
आरएसएस प्रमुख ने इस अवसर पर शिक्षा प्रणाली और संस्कारों के बीच तालमेल की जरूरत पर भी बात की। उन्होंने कहा कि केवल विद्या देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बच्चों को जीवन मूल्यों की शिक्षा भी देनी चाहिए। भारतीय संस्कृति में शिक्षा को हमेशा चरित्र निर्माण से जोड़ा गया है, लेकिन आधुनिक शिक्षा प्रणाली में यह पक्ष कुछ हद तक कमजोर हुआ है।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों और अभिभावकों को मिलकर काम करना चाहिए ताकि विद्यार्थियों में न केवल ज्ञान, बल्कि नैतिकता और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो। जब शिक्षा और संस्कार एक साथ चलेंगे, तब समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा।
बेटियों की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता पर बल
मोहन भागवत ने अपने भाषण में बेटियों की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि “बेटियों को इतना सक्षम और सजग बनाना होगा कि वे किसी के बहकावे में न आएं।” उन्होंने यह भी कहा कि केवल सुरक्षा कानूनों से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और जागरूकता से ही बेटियां खुद को सुरक्षित रख सकती हैं।
भागवत ने माता-पिता से अपील की कि वे अपनी बेटियों में आत्म-सम्मान, साहस और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करें। उन्होंने कहा, “जब बेटियां आत्मनिर्भर होंगी, तो वे किसी भी तरह की नकारात्मक प्रवृत्ति का शिकार नहीं बनेंगी।”
आरएसएस की सामाजिक भूमिका पर चर्चा
कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख ने संगठन की सामाजिक भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में भारतीय संस्कृति का प्रसार करना है। उन्होंने कहा कि आरएसएस परिवार-संस्कृति को राष्ट्र की मूल शक्ति मानता है और इसी आधार पर वह समाज को संगठित करने का प्रयास करता है।
भागवत ने कहा कि “हमारा लक्ष्य समाज को आपसी विश्वास और सहयोग के माध्यम से मजबूत बनाना है। जब हर व्यक्ति अपने परिवार, धर्म और संस्कृति को समझेगा, तभी भारत विश्व में नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभा सकेगा।”
जागरूक परिवार ही सशक्त समाज की नींव
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि समाज में सुधार का सबसे प्रभावी तरीका सरकार या नीति नहीं, बल्कि लोगों की सोच में परिवर्तन है। उन्होंने कहा, “कानून अपना काम करेगा, लेकिन यदि परिवार अपने संस्कारों को नहीं बचाएगा, तो कोई भी कानून समाज को नहीं बचा सकता।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार माता-पिता अपने बच्चों के जीवन में अत्यधिक व्यस्तता के चलते शामिल नहीं हो पाते, जिससे उनका मार्गदर्शन कमजोर हो जाता है। यही कारण है कि आज युवाओं में मानसिक तनाव, भ्रम और असंतुलन बढ़ रहा है।
भागवत ने कहा कि परिवार का अर्थ केवल रक्त-संबंध नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी है। जब यह जुड़ाव मजबूत होगा, तो समाज भी अधिक सशक्त बनेगा।
युवाओं में नैतिकता और जिम्मेदारी की भावना
अपने भाषण के अंत में उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल व्यक्तिगत सफलता पर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों पर भी ध्यान दें। उन्होंने कहा कि युवा ही देश का भविष्य हैं, और यदि वे नैतिक और सजग रहेंगे, तो किसी भी तरह की सामाजिक चुनौती का सामना देश कर पाएगा।
भागवत ने प्रेरित करते हुए कहा, “हमारे सामने आज़ादी की लड़ाई जितनी बड़ी चुनौतियां नहीं हैं, लेकिन हमारी जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी है—संस्कृति और आचरण की रक्षा।”
निष्कर्ष: परिवार से ही शुरू होता है परिवर्तन
मोहन भागवत के इस बयान ने फिर से इस बात पर ज़ोर दिया कि समाजिक परिवर्तन किसी नीति या आंदोलन से नहीं, बल्कि घर के स्तर से शुरू होता है। उन्होंने कहा कि जब हर परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, संवाद बनाए रखेगा और बच्चों को भारतीय संस्कृति के प्रति सजग करेगा, तभी समाज सुरक्षित और सशक्त बनेगा।
उन्होंने अंत में कहा कि “हम सबको मिलकर अपने घरों में संवाद, संस्कार और सम्मान की परंपरा को आगे बढ़ाना है। यही भारत की असली ताकत है, और यही भविष्य की सुरक्षा की कुंजी भी।”
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