पाकिस्तान का जल चेतावनी! चेनाब हाइड्रो प्रोजेक्ट से भारत को घेरा, IWT पर नया विवाद

भारत की चेनाब नदी पर बन रही पनबिजली परियोजनाओं के चलते पाकिस्तान में हलचल मच गई है। इस्लामाबाद एक बार फिर से सिंधु जल समझौते का हवाला देकर भारत की इन परियोजनाओं का विरोध कर रहा है।

पाकिस्तान का दावा है कि इन योजनाओं से सिंधु प्रणाली की नदियों के बहाव पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और उसे मिलने वाले पानी की मात्रा में कमी आ सकती है। भारत ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है और कहा है कि सभी परियोजनाएं पूरी तरह समझौते के प्रावधानों के अनुरूप विकसित की जा रही हैं।
भारत कर रहा है ‘तकनीकी छल’ —पाकिस्तान की शिकायत
पाकिस्तान ने आरोप लगाया है कि भारत “रन ऑफ द रिवर” परियोजनाओं के नाम पर वास्तव में बड़ी-बड़ी जल संरचनाएं खड़ी कर रहा है जो भंडारण परियोजनाओं जैसी दिखती हैं। उसका कहना है कि इससे जल प्रवाह को रोका जा सकता है और सूखे महीनों में पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
इस्लामाबाद का विदेश मंत्रालय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मामला दोबारा उठाने की तैयारी में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान जल्द ही विश्व बैंक और स्थायी मध्यस्थ न्यायालय (PCA) के समक्ष एक नई याचिका दाखिल कर सकता है ताकि भारत की इन परियोजनाओं की जांच कराई जा सके।
भारत का जवाब — परियोजनाएं पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी
नई दिल्ली का रुख साफ है कि भारत ने सिंधु जल समझौते के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया है। भारत के जल शक्ति मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, चेनाब और झेलम जैसी नदियों पर ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजनाएं बनाना समझौते में स्पष्ट रूप से अनुमेय है। इन परियोजनाओं में पानी को स्थायी रूप से नहीं रोका जाता, बल्कि ऊर्जा उत्पादन के बाद वही पानी नीचे की ओर बहने दिया जाता है।
भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान बार-बार इस तरह की तकनीकी आपत्तियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए करता है। भारत ने इस बार भी पाकिस्तान को तकनीकी स्तर की वार्ता के लिए आमंत्रित किया, लेकिन पाकिस्तान ने इसे ठुकरा दिया और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का रास्ता चुना।
चेनाब परियोजनाएं — जम्मू-कश्मीर की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की कुंजी
भारत की चेनाब पर कई प्रमुख पनबिजली परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जिनमें रतले परियोजना और पाकल डुल परियोजना सबसे महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों योजनाएं जम्मू-कश्मीर को बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर बना सकती हैं।
- रतले हाइड्रो प्रोजेक्ट — इसकी क्षमता लगभग 850 मेगावॉट है और यह किश्तवाड़ जिले में बन रहा है। यह परियोजना प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत मंजूर की गई थी।
- पाकल डुल पनबिजली परियोजना — 1000 मेगावॉट की इस परियोजना से जम्मू-कश्मीर में बिजली आपूर्ति में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये दोनों परियोजनाएं न केवल राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारेंगी बल्कि भारत के उत्तर क्षेत्र को अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा भी उपलब्ध कराएंगी।
विशेषज्ञों की राय — पाकिस्तान का विरोध तकनीकी नहीं, राजनीतिक है
जल मामलों के विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की आपत्ति तकनीकी कम और राजनीतिक ज्यादा है। दरअसल, भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा आत्मनिर्भरता और जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में प्रगति से पाकिस्तान चिंतित है।
पूर्व जल आयुक्त के.सी. सिंह के अनुसार, “भारत की परियोजनाएं विश्वस्तरीय मानकों के अनुरूप हैं। पाकिस्तान बार-बार ‘जल सुरक्षा’ का मुद्दा उठाकर अपने घरेलू राजनीतिक हित साधने की कोशिश करता है।”
अंतरराष्ट्रीय समीक्षक यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान का रवैया हमेशा ‘रिएक्टिव’ यानी प्रतिक्रियात्मक रहा है। वह भारत की विकास योजनाओं के विरोध को अपने घरेलू राजनीतिक एजेंडे में इस्तेमाल करता है ताकि जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाया जा सके।
सिंधु जल समझौता — 65 साल से निभ रहा संतुलन
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल समझौता हुआ था। इसके तहत छह प्रमुख नदियों का बंटवारा इस प्रकार किया गया:
- रावी, ब्यास और सतलज — भारत के हिस्से में
- सिंधु, झेलम और चेनाब — पाकिस्तान के हिस्से में
हालांकि, समझौते में यह भी साफ कहा गया था कि भारत पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) के जल का “गैर-उपभोगी” उपयोग जैसे बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए सीमित मात्रा में कर सकता है। यही प्रावधान भारत की मौजूदा परियोजनाओं का कानूनी आधार है।
पाकिस्तान की रणनीति — अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश
हाल के वर्षों में इस मुद्दे पर कई बार विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग की है, लेकिन ज्यादातर मामलों में उसे ठोस समर्थन नहीं मिला। 2023 और 2024 में भी उसने भारत की परियोजनाओं पर आपत्ति जताई थी, लेकिन विश्व बैंक ने कहा था कि दोनों देशों को तकनीकी स्तर के संवाद से ही समाधान निकालना चाहिए।
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एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी के मुताबिक, “हर बार जब भारत अपनी ऊर्जा परियोजनाओं को आगे बढ़ाता है, पाकिस्तान इसे एक विवाद में बदल देता है। यह उसकी राजनीतिक रूटीन स्ट्रेटेजी है।”
तकनीकी समाधान और सहयोग पर जोर
भारत ने फिर दोहराया है कि वह समझौते का सम्मान करता है और दोनों देशों के जल आयोगों के बीच नियमित संवाद का समर्थन करता है। अधिकारियों के अनुसार, भारत हर साल पाकिस्तान को नदियों का हाइड्रोलॉजिकल डेटा उपलब्ध कराता है और सभी निर्माण गतिविधियां पारदर्शी रूप से साझा करता है।
भारत का कहना है कि यदि पाकिस्तान वास्तव में सहयोग चाहता है, तो उसे बातचीत के रास्ते पर लौटना चाहिए। लेकिन अगर वह हर तकनीकी मसले को राजनीति में लपेट देगा, तो समाधान संभव नहीं होगा।
स्थानीय स्तर पर उम्मीदें — क्षेत्र में विकास की नई किरण
चेनाब पर बन रहीं परियोजनाओं को लेकर जम्मू-कश्मीर में लोगों में काफी उम्मीदें हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल रहा है, सड़क और बिजली ढांचा सुधर रहा है। नागरिकों का कहना है कि यह क्षेत्र लंबे समय से पिछड़ा रहा, लेकिन अब बड़े प्रोजेक्ट्स से विकास की दिशा बदल रही है।
स्थानीय प्रतिनिधि बताते हैं कि यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो जम्मू-कश्मीर न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा बल्कि उत्तर भारत को भी बिजली निर्यात कर पाएगा। इससे राज्य का राजस्व बढ़ेगा और पर्यटन के साथ औद्योगिक विकास को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत आत्मनिर्भर, पाकिस्तान असहज
भारत की चेनाब पनबिजली परियोजनाएं देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के बड़े कदम के रूप में देखी जा रही हैं। वहीं पाकिस्तान की बेचैनी इस बात की गवाही देती है कि भारत की प्रगति उसके लिए राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु जल समझौते की आड़ में पाकिस्तान का यह विरोध लंबे समय तक नहीं टिकेगा। भारत अपनी तकनीकी और कानूनी मजबूती के बल पर आगे बढ़ता रहेगा और दक्षिण एशिया के ऊर्जा परिदृश्य में अहम भूमिका निभाएगा।

