उत्तर प्रदेश का बदायूं जिला इन दिनों एक अजीब किस्म के डर में जी रहा है। जिले के पिपरौल गांव में एक भैंस की मौत के बाद ग्रामीणों के बीच रेबीज का खतरा मंडरा रहा है। बताया जा रहा है कि इस भैंस को कुछ दिन पहले एक पागल कुत्ते ने काट लिया था, जिसके बाद वह बीमार रहने लगी और आखिरकार उसकी मौत हो गई। हालांकि मामला तब गंभीर हो गया जब पता चला कि मृत भैंस का दूध गाँव की तेरहवीं की दावत में इस्तेमाल हुआ था।

गांव में तेरहवीं की दावत में करीब 200 लोगों ने उसी दूध से बना रायता खाया, जिसके बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। हर कोई डर के साये में है कि कहीं उन्हें भी रेबीज का संक्रमण न हो गया हो।

कैसे हुआ पूरा मामला

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, घटना करीब एक हफ्ते पहले की है जब गांव में एक आवारा कुत्ता लगातार पशुओं पर हमला कर रहा था। उसी कुत्ते ने गांव निवासी रामस्वरूप की भैंस को भी काट लिया था। परिवार ने स्थानीय पशु चिकित्सक को दिखाया, लेकिन कुछ ही दिनों में भैंस की मौत हो गई।

भैंस के मरने के बाद परिवार ने उसका दूध फेंकने के बजाय तेरहवीं के मौके पर बने भोजन में इस्तेमाल किया, क्योंकि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि पागल कुत्ते के काटने के बाद दूध या मांस भी संक्रमित हो सकता है।
तेरहवीं में पूरे गांव से लोग जुटे थे — बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं — सभी ने भोजन में शामिल रायता खाया। बाद में किसी ने बताया कि भैंस को पागल कुत्ता काट चुका था, तब जाकर दावत में भाग लेने वाले लोग सहम गए।

गांव में दहशत का माहौल

जब यह खबर फैली कि मृत भैंस पागल कुत्ते के हमले में मारी गई थी, तो गांव में जबरदस्त डर का माहौल बन गया। कई लोगों ने रातों रात स्वास्थ्य केंद्र का रुख किया। कुछ लोग तो इतनी घबराहट में थे कि उन्होंने स्वयं जाकर दवा की दुकानों से रेबीज के टीके लगवा लिए।

गांव की निवासी गीता देवी कहती हैं, “हम सबने तो रायता खाया था। बाद में जब पता चला कि भैंस को पागल कुत्ते ने काटा था, तो हम सब डर गए। अब रोज डॉक्टर के पास जा रहे हैं।” ग्रामीणों के चेहरों पर साफ डर देखा जा सकता है। बच्चों में तो भय और भी ज़्यादा है क्योंकि कई बार वे वही दूध पीते थे।

स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की टीम सक्रिय

मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग और पशुपालन विभाग की संयुक्त टीम गांव पिपरौल पहुंची। टीम ने पहले मृत भैंस का पूरा ब्योरा लिया और उसकी सैंपल रिपोर्ट्स जांच के लिए भेजीं। साथ ही जिन्होंने रायता खाया था, उन्हें पहचान कर प्रोफिलैक्टिक इलाज (सावधानी के तौर पर दिया जाने वाला टीका) लगाने की सलाह दी गई।

डॉ. एके शर्मा, जिला पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताया, “भैंस को रेबीज संक्रमित कुत्ते द्वारा काटे जाने की पुष्टि हुई है। दूध या मांस से संक्रमण का खतरा बहुत कम होता है, लेकिन एहतियात के तौर पर हमने सभी गांववालों को जागरूक किया है और जिन्हें आवश्यकता है, उन्हें रेबीज की वैक्सीन लगाई जा रही है।”

क्या है रेबीज और कैसे फैलता है संक्रमण

रेबीज (Rabies) एक घातक वायरल बीमारी है जो आमतौर पर संक्रमित जानवर के काटने या उसके लार के संपर्क में आने से फैलती है। यह वायरस तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है और इलाज न मिलने पर मौत का कारण बन सकता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि रेबीज से बचाव का एकमात्र तरीका है — समय पर टीका लगवाना। यदि किसी व्यक्ति को कुत्ते, बिल्ली या अन्य जानवर ने काट लिया हो, तो ज़ख्म को तुरंत साबुन और पानी से धोने के बाद पास के स्वास्थ्य केंद्र पर वैक्सीन लगवाना ज़रूरी है।

भैंस के दूध से फैल सकता है संक्रमण?

कई ग्रामीणों में यह सवाल उठा कि क्या रेबीज संक्रमित भैंस का दूध पीने या उससे बना रायता खाने से बीमारी फैल सकती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसा बहुत दुर्लभ है, लेकिन पूरी तरह संभव भी नहीं कहा जा सकता।

आईयूसीएन (International Union for Conservation of Nature) और अन्य संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि रेबीज वायरस ऊँचे तापमान पर नष्ट हो जाता है, लेकिन अगर दूध को कच्चा या अधपका खाया जाए, तो संक्रमण का खतरा रह सकता है। इस कारण डॉक्टर सलाह देते हैं कि ऐसे मामलों में बिना जांच दूध उत्पादों का सेवन न करें।
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प्रशासन ने जारी की सलाह और चेतावनी

जिला प्रशासन ने गांव में मुनादी करवाई है कि किसी भी अज्ञात या पागल जानवर को न छुएं, और अगर किसी को भी खरोंच, काटने या लार के संपर्क की शंका हो, तो तुरंत स्वास्थ्य विभाग को सूचित करें।
इसके साथ ही गांव में टीमों को तैनात किया गया है जो टीका लगाने और लोगों की निगरानी कर रही हैं।

बदायूं के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. आर.एस. यादव के अनुसार, “अभी तक किसी में संक्रमण के लक्षण नहीं मिले हैं, लेकिन यह एक प्रिवेंटिव (सावधानीपूर्ण) कदम है। जिन लोगों ने रायता खाया था, उनका रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।”

गांव में बढ़ी जागरूकता और सतर्कता

मामले के बाद अब गांव के लोग अपने पशुओं की देखरेख पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। पशु पालक अपने जानवरों के लिए वैक्सीन लगवाने की लाइन में हैं। कुछ लोगों ने तो अपने कुत्तों को भी टीका लगवाने की शुरुआत की है।

गांव के प्रधान ने बताया कि “यह घटना हम सबके लिए एक सबक है। हमने तय किया है कि अब कोई भी जानवर अगर किसी अज्ञात कुत्ते या बिल्ली से घायल होगा तो उसे तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाया जाएगा। रेबीज जैसी बीमारी के लिए लापरवाही जानलेवा हो सकती है।”

विशेषज्ञों की राय: डर नहीं, जागरूकता जरूरी

रेबीज विशेषज्ञों और डॉक्टरों का कहना है कि बेहद कम संभावना के बावजूद सावधानी जरूरी है। डॉ. सुशील अग्रवाल, सीनियर फिजिशियन, ने बताया, “लोग डर और अफवाह में कई बार गलत फैसले ले लेते हैं। यह समझना चाहिए कि रेबीज संक्रमण मुख्यतः काटने से होता है, खाने से नहीं। लेकिन सावधानी और टीकाकरण सबसे सुरक्षित रास्ता है।”

समापन: एक घटना जिसने दिला दी चेतावनी

पिपरौल गांव की यह घटना भले ही अद्वितीय लगे, मगर यह स्पष्ट करती है कि ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी आज भी बड़ी चुनौती है। यदि पशु पालक समय पर पशुओं को वैक्सीन लगवाते और डॉक्टर की सलाह लेते, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती।

अब गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार काम कर रही हैं, और ग्रामीण भी धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। पर इस घटना ने सबको यह सिखा दिया है कि पागल जानवर या असामान्य पशु व्यवहार को नज़रअंदाज़ करना खतरनाक साबित हो सकता है।

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