भारत को किसी से घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि रूस हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। दोनों देशों के बीच 75 साल से ज्यादा पुरानी ‘स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ इतनी मजबूत है कि दुनिया की कोई ताकत इसे हिला नहीं सकती।

पुतिन-मोदी की आगामी मुलाकात से रक्षा, ऊर्जा और व्यापार में नई ऊंचाइयों को छूने का लक्ष्य है, जिसमें 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का सपना साकार होगा।

पुतिन-मोदी की महत्वपूर्ण वार्ता: क्या होगा एजेंडा?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 4-5 दिसंबर 2025 को भारत पहुंच रहे हैं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सालाना शिखर सम्मेलन होगा। इस दौरान रक्षा सौदे, सस्ते रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति और रुपये-रूबल भुगतान प्रणाली जैसे मुद्दों पर बड़े फैसले होंगे। खासतौर पर S-400 मिसाइल सिस्टम की अतिरिक्त यूनिट्स, Su-57 फाइटर जेट्स और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत संयुक्त उत्पादन पर चर्चा तेज होगी।

75+ साल की अटूट दोस्ती: 10 ऐतिहासिक पड़ाव

भारत-रूस रिश्ते की नींव 1947-48 में पड़ी, जब आजादी के ठीक बाद दोनों ने राजनयिक संबंध स्थापित किए, जो आज 78 साल की मजबूत साझेदारी बन चुके हैं। 1971 में ‘पीस एंड फ्रेंडशिप ट्रीटी’ ने भारत को युद्ध के दौरान मजबूत समर्थन दिया। सोवियत सहयोग से भारत के भारी उद्योग और शिक्षा क्षेत्र को बल मिला।

सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रिश्ते अटूट रहे, 2000 में ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का दर्जा मिला और 2010 में इसे ‘स्पेशल एंड प्रिविलेज्ड’ बनाया गया। रक्षा में Su-30MKI, T-90, ब्रह्मोस और S-400 जैसे हथियार भारत की ताकत बने, जबकि ऊर्जा क्षेत्र में सस्ता रूसी तेल ने महंगाई रोकी। कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट और स्पेस सहयोग ने हाई-टेक दोस्ती को मजबूत किया। यूक्रेन संकट के बावजूद भारत ने रूस के साथ संतुलन बनाए रखा।

भारत को डर क्यों नहीं लगना चाहिए?

रूस भारत को अपना सबसे भरोसेमंद साथी मानता है और नई डील्स से रक्षा-ऊर्जा सहयोग बढ़ाएगा। 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य से दोनों देश लाभान्वित होंगे।

भविष्य की राह: नए क्षेत्रों में साझेदारी

संयुक्त रक्षा उत्पादन, सिविल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स जैसे कुडनकुलम विस्तार और स्पेस टेक्नोलॉजी पर फोकस रहेगा। क्षेत्रीय सुरक्षा, यूक्रेन और इंडो-पैसिफिक मुद्दों पर समन्वय से रिश्ते नए दौर के अनुरूप ढलेंगे।

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