संभल जज विभांशु सुधीर ट्रांसफर: 12 साल में 8वां तबादला, अनुज चौधरी FIR का बदला या रूटीन प्रक्रिया?

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) विभांशु सुधीर का हालिया ट्रांसफर पूरे न्यायिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को जारी आदेश में उन्हें सुल्तानपुर के सीनियर सिविल डिवीजन जज के पद पर भेज दिया। उनके 12 साल के न्यायिक सफर में यह आठवां ट्रांसफर है, जो संभल हिंसा मामले में पुलिस अधिकारियों पर एफआईआर के आदेश से जोड़कर देखा जा रहा है।
विभांशु सुधीर का प्रोफेशनल बैकग्राउंड
विभांशु सुधीर का जन्म 20 अगस्त 1990 को भदोही जिले में हुआ था। 2013 में सुल्तानपुर से अपने न्यायिक करियर की शुरुआत करने वाले सुधीर ने एटा, मुरादाबाद, चंदौली, गाजियाबाद, ललितपुर, आगरा और संभल जैसे कई जिलों में सेवा दी। 18 सितंबर 2025 को वे संभल के सीजेएम बने। छोटे से करियर स्पैन में इतने ट्रांसफर असामान्य माने जा रहे हैं।
संभल हिंसा की पृष्ठभूमि
संभल में 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा ने पूरे देश का ध्यान खींचा। जमा मस्जिद सर्वे के विरोध में भड़की यह घटना पुलिस कार्रवाई के बाद और तीव्र हो गई। यामीन नामक व्यक्ति ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि उनके बेटे आलम को बिना उकसावे के तीन गोलियां मारी गईं। 6 फरवरी 2025 को दाखिल इस याचिका पर सीजेएम विभांशु सुधीर ने 9 जनवरी 2026 को सुनवाई की।
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विवादास्पद एफआईआर आदेश का पूरा विवरण
9 जनवरी 2026 को सीजेएम सुधीर ने ऐतिहासिक आदेश जारी किया, जिसमें एएसपी अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर समेत 20 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। आदेश में कहा गया कि पुलिस ने संभल हिंसा के दौरान अकारण गोलीबारी की, जिससे निर्दोष युवक घायल हुए। इससे पहले भी उन्होंने फर्जी एनकाउंटर के एक मामले में 13 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई का आदेश दिया था। पुलिस ने इसकी आलोचना की और इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की बात कही।
ट्रांसफर आदेश की टाइमिंग पर सवाल
ट्रांसफर आदेश 20 जनवरी 2026 को जारी हुआ, ठीक एफआईआर की समयसीमा (22 जनवरी) खत्म होने से पहले। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक साथ 14 जजों के ट्रांसफर की लिस्ट जारी की, जिसमें सुधीर प्रमुख थे। चंदौसी कोर्ट के सिविल जज आदित्य सिंह को संभल का नया सीजेएम बनाया गया। आदित्य सिंह ने पहले जामा मस्जिद सर्वे का आदेश दिया था, जो संवेदनशील मामला रहा। कई लोग इसे संयोग नहीं मान रहे।
वकीलों का आक्रोश और प्रदर्शन
ट्रांसफर की खबर मिलते ही संभल कोर्ट में वकीलों ने जोरदार प्रदर्शन किया। ‘सीजेएम साहब को वापस लाओ’ के नारे लगे। वकीलों का आरोप है कि पुलिस दबाव में यह तबादला हुआ। प्रदर्शन में सैकड़ों वकील शामिल हुए, जिससे कोर्ट कार्य प्रभावित रहा। सोशल मीडिया पर भी #JusticeForVibhanshuSudhir ट्रेंड करने लगा।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और विपक्ष का रुख
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पुलिस के खिलाफ फैसले के बाद जज का ट्रांसफर लोकतंत्र के लिए खतरा है। अन्य विपक्षी दलों ने भी इसे प्रशासनिक दुरुपयोग बताया। बीजेपी ने इसे रूटीन प्रक्रिया करार दिया। राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
नया सीजेएम आदित्य सिंह कौन?
आदित्य सिंह चंदौसी कोर्ट के सीनियर डिवीजन सिविल जज थे। वे जामा मस्जिद को हरिहर मंदिर बताने वाली याचिका पर सुनवाई कर चुके हैं और सर्वे आदेश दे चुके हैं। उनका आगमन संभल के संवेदनशील माहौल में नया मोड़ ला सकता है। स्थानीय लोग दोनों फैसलों की तुलना कर रहे हैं।
न्यायिक ट्रांसफर प्रक्रिया कैसे काम करती है?
उत्तर प्रदेश में जजों के ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रशासनिक कमेटी तय करती है। सामान्यत: वार्षिक या अर्धवार्षिक लिस्ट जारी होती है। लेकिन टाइमिंग ने संदेह पैदा किया। विशेषज्ञों का कहना है कि 12 साल में 8 ट्रांसफर औसत से ज्यादा है, जो जज की सक्रियता को दर्शाता है।
संभल हिंसा का व्यापक प्रभाव
नवंबर 2024 की हिंसा में कई मौतें हुईं, जिसमें धार्मिक तनाव प्रमुख था। सर्वे विवाद से उपजी यह घटना पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठा रही है। सीजेएम का आदेश इसकी पहली न्यायिक सफलता था, लेकिन ट्रांसफर ने इसे कमजोर कर दिया। मामला हाईकोर्ट जा सकता है।
सोशल मीडिया और जनभावना
ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब पर वीडियो वायरल हो रहे हैं। वकीलों के प्रदर्शन के क्लिप्स लाखों व्यूज बटोर चुके। लोग #SaveJudiciaryJudges जैसे हैशटैग चला रहे। यह मामला न्यायपालिका-पुलिस संबंधों पर बहस छेड़ रहा है।
पुलिस का पक्ष और अगला कदम
संभल एसपी ने एफआईआर से इनकार किया और हाईकोर्ट जाने की बात कही। ट्रांसफर के बाद पुलिस की अपील मजबूत हो सकती है। यामीन की याचिका पर अब नया सीजेएम फैसला लेगा। मामला लंबा खिंच सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
यह ट्रांसफर उत्तर प्रदेश न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। यदि हाईकोर्ट अपील खारिज करता है, तो बड़ा संदेश जाएगा। वरना, जजों पर दबाव की धारणा मजबूत होगी। संभल जैसे संवेदनशील जिलों में न्याय की उम्मीद बनी रहेगी।
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