निठारी कांड: 19 साल बाद सुरेंद्र कोली की रिहाई, सुप्रीम कोर्ट ने दी कोर्ट से मुक्त होने की मंजूरी

2006 में नोएडाके निठारी इलाके में हुए भयावह हत्याकांड के 19 साल बाद सुप्रीम कोर्टने मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस मामले में कुल 16 केस दर्ज थे, जिनमें से 13 मामलों में ट्रायल कोर्ट ने कोली को मौत की सजा सुनाई थी।

घटना और आरोप
निठारी कांड की शुरुआत तब हुई जब नोएडा के सेक्टर 31 में मोनिंदर सिंह पंधेर के डुप्लेक्स घर के पीछे से बच्चों और महिलाओं के शव मिले। सुरेंद्र कोली, जो पंधेर का नौकर था, पर आरोप लगा कि उसने बच्चों को लालच देकर घर बुलाया, उनके साथ दुष्कर्म किया और हत्या कर शवों को नाले में फेंका। जांच एजेंसियों ने कोली को एक ‘नरभक्षी’ तक कहा, क्योंकि उस पर शवों का मांस खाने का भी आरोप था।
केस की स्थिति और सजा
कोली को 2009-2010 में एक दर्जन से अधिक मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ मामलों में यह सजा बरकरार रखी। कोली लगभग 16 साल तक डेथ रो पर रहा, फिर दया याचिका में देरी के कारण उसकी सजा उम्रकैद में बदल गई।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और रिहाई का आधार
2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मामलों में कोली को सबूतों की कमी और जांच में गड़बड़ी के कारण बरी कर दिया। सीबीआई और यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
मुख्य मुद्दा था कि कोली के कई कबूलनामे संदिग्ध थे, फॉरेंसिक सबूत अवैध या गड़बड़ थे, और जांच एजेंसियों की जांच में भारी लापरवाही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और आधारहीन आरोपों पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 11 नवंबर 2025 को कोर्ट ने क्यूरेटिव पिटीशन पर अंतिम फैसला सुनाते हुए कोली को सभी आरोपों से मुक्त किया और तुरंत रिहाई का आदेश दिया।
पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद पीड़ित परिवारों में आक्रोश देखा गया। उन्होंने न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाए कि आखिरकार बलात्कार और हत्या के आरोप में कोली को कैसे रिहा किया जा सकता है। परिवारों का कहना है कि असली अपराधी आज भी बाहर है। वह दृश्य न्याय की उम्मीदें टूटने के कारण गहरे सदमे में हैं।
न्याय व्यवस्था की ताकत और कमजोरी
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा और सिद्धांतों का पालन करता है कि दोष सिद्धि के लिए अटूट सबूत होने चाहिए। हालांकि, यह सवाल हुआ है कि जहां जांच एजेंसियां लापरवाही करें वहाँ सच्चाई कैसे सामने आएगी। निठारी कांड के इस अध्याय में इस तरह 19 साल बाद कोली की रिहाई ने न्याय व्यवस्था की ताकत और कमजोरियों दोनों को उजागर किया है।
यह फैसला बताता है कि न्याय की अंतिम कसौटी साक्ष्यों की मजबूती और निष्पक्ष जांच होती है, न कि चर्चित आरोपों की स्वीकारोक्ति। सुरेंद्र कोली अब 19 साल की जेल अवधि के बाद आजाद है, लेकिन देश में निठारी कांड के पीड़ितों के लिए न्याय की असली लड़ाई अभी बाकी है।
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