तेजस्वी यादव के कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग को लेकर दिल्ली में हुई महागठबंधन की बैठक बेनतीजा रही, और तेजस्वी यादव राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से मिले बिना ही पटना लौट गए हैं. सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान तेजस्वी ने स्पष्ट कहा कि मौजूदा हालात में गठबंधन आगे नहीं बढ़ सकता, और बैठक से निकलते समय ‘देखेंगे और जवाब देंगे’ कहा.​

क्या हुआ बैठक में?

  • आरजेडी (RJD) और कांग्रेस के बीच सीटों के चयन को लेकर मतभेद चल रहे हैं.
  • आरजेडी कांग्रेस को 60-61 सीटें देने को तैयार है, लेकिन कांग्रेस कुछ खास सीटों की मांग पर अड़ी है, जिन पर आरजेडी तैयार नहीं है.
  • राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं को सीटों पर कड़ा मोलभाव करने के निर्देश दिए हैं.
  • दोनों दलों के शीर्ष नेताओं की बैठक के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका.

तेजस्वी बिना मिले लौटे क्यों?

  • मीटिंग के बीच, तेजस्वी यादव दिल्ली एयरपोर्ट से पटना रवाना हो गए, राहुल गांधी व खड़गे से आमने-सामने नहीं मिले, हालांकि फोन पर बातचीत जरूर हुई.​​
  • बैठक में कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और बिहार कांग्रेस के नेता मौजूद थे.​
  • सूत्रों के अनुसार, नतीजा न निकलता देख तेजस्वी ने यह निर्णय लिया.

गठबंधन में बढ़ी तल्खी क्यों?

  • कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीटों के चयन को लेकर तनातनी बढ़ी है; कांग्रेस अपनी पसंद की कुछ सीटों के लिए अड़ी हुई है, आरजेडी उन सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं है.
  • दोनों सहयोगी दल ऑफर और मांग के फॉर्मूले में भी अड़े हुए हैं.
  • नेताओं के व्यवहार और बयानों से साफ है कि पिछले दिनों से असंतोष और तनाव बढ़ा है.

आगे क्या?

  • दोनों दलों ने कहा है कि कोशिशें जारी हैं और अंतिम निर्णय की उम्मीद अब भी जताई जा रही है, लेकिन फिलहाल महागठबंधन में स्पष्ट सहमति नहीं बन पाई है.
  • अब निगाहें दोनों दलों के अगले कदम और संभावित समझौते या टकराव पर टिकी हैं.

यह स्थिति बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए महागठबंधन के भीतर गंभीर मतभेद और राजनीतिक रणनीति की जटिलता को दर्शाती है.

​महागठबंधन में तल्खी के कारण

महागठबंधन में तल्खी (तनाव) के मुख्य कारण सीट शेयरिंग यानी सीटों के बंटवारे को लेकर गहरे विवाद और घटक दलों की अपनी-अपनी जरूरतें और अपेक्षाएं हैं.

प्रमुख कारण

  • सीटों की संख्या पर असहमति: कांग्रेस कम से कम 60-65 सीटें चाहती है, जबकि आरजेडी उसे 55-61 से ज़्यादा देने के पक्ष में नहीं है.
  • मनपसंद सीटों की मांग: दोनों दल कुछ ख़ास सीटों पर खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं, जिन पर दूसरी पार्टी भी दावेदारी कर रही है. इससे कई सीटों पर खींचतान है.
  • घटक दलों के हित: सिंहासन बंटवारे में सिर्फ आरजेडी और कांग्रेस ही नहीं, बल्कि वीआईपी, वाम दल, झामुमो जैसे छोटे सहयोगी दल भी अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों की सीटें मांग रहे हैं, जिससे पेच और बढ़ जाता है.
  • टिकट बंटवारे में जल्दबाजी: आरजेडी ने कई सीटों पर जल्द टिकट बांट दिए जिससे सहयोगी दल नाराज हो गए, बाद में सिंबल वापस भी मंगवाना पड़ा.
  • कांग्रेस के अंदरुनी मतभेद: कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी को अपनी शर्तों पर या अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, जिससे असंतोष बढ़ा है.
  • मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर विवाद: कांग्रेस की ओर से उम्मीद की जाती है कि फैसलों में उनकी भी हिस्सेदारी हो, जबकि आरजेडी तेजस्वी को स्पष्ट नेता मानकर चल रही है.
  • एनडीए के मुकाबले तेजी: एनडीए में सीटों का बंटवारा पहले और स्पष्टता से हो गया, जबकि महागठबंधन अब भी खींचतान में उलझा है, जिससे दबाव बढ़ा है.

इन सारी वजहों से महागठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे और आपसी तालमेल को लेकर तल्खी और अविश्वास की स्थिति बनी है.महागठबंधन में तल्खी के मुख्य कारण सीटों के बंटवारे पर असहमति, मनपसंद सीटों की जिद, घटक दलों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं और आंतरिक असंतोष हैं।

असहमति के प्रमुख कारण

  • कांग्रेस और आरजेडी एक-दूसरे को अपनी अपेक्षित सीटें देने को तैयार नहीं हैं—कांग्रेस कम से कम 60-65 सीट चाहती है जबकि आरजेडी इससे कम देना चाहता है।
  • दोनों दलों की कुछ खास सीटों पर समान दावेदारी है, जिससे कई सीटों पर टकराव है।
  • सहयोगी दलों वीआईपी, वामपंथी और अन्य पार्टियों की खुद की मांगें, जिससे फॉर्मूला बनना कठिन हो गया है।
  • आरजेडी ने कई सीटों पर एडवांस टिकट देकर और बाद में सिंबल वापस मंगवाकर सहयोगी दलों की नाराजगी बढ़ा दी।
  • कांग्रेस के भीतर भी एक गुट अकेले चुनाव लड़ने के पक्ष में है, जिससे अंदरूनी भ्रम की स्थिति है।
  • एनडीए ने सीटों का बंटवारा पहले ही सार्वजनिक कर दिया, जिससे महागठबंधन पर समय का दबाव बढ़ गया है।

इन वजहों से गठबंधन में लगातार तनाव और अविश्वास का माहौल बना हुआ है।

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