काशी के पवित्र मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के बाद चिता की राख पर 94 अंक लिखने की सदियों पुरानी परंपरा ने लोगों के बीच बहस छेड़ दी है। यह रिवाज आस्था का प्रतीक माना जाता है या अंधविश्वास? जानकारों के अनुसार, यह मृत आत्मा को मोक्ष दिलाने का संदेश देता है।​

मणिकर्णिका घाट की अनोखी परंपरा

मणिकर्णिका घाट पर हर दाह संस्कार के बाद चिता ठंडी होने पर राख में उंगली या काठ से 94 लिखा जाता है। यह केवल काशी जैसे पवित्र स्थानों तक सीमित है, जहां चिता की अग्नि कभी नहीं बुझती। पुजारी इसे शिव भक्ति का हिस्सा बताते हैं।

94 का आध्यात्मिक रहस्य

मान्यता है कि मनुष्य के जीवन में 100 कर्म होते हैं, जिनमें 6—जन्म, मृत्यु, यश, अपयश, लाभ और हानि—भगवान के नियंत्रण में होते हैं। शेष 94 कर्म व्यक्ति के अपने होते हैं, जिन्हें चिता की अग्नि में भस्म कर शिव को समर्पित किया जाता है। इससे आत्मा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।

आस्था बनाम अंधविश्वास की बहस

कुछ लोग इसे शास्त्रों में अनुपस्थित बताकर अंधविश्वास कहते हैं, जबकि भक्त इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही सच्ची श्रद्धा मानते हैं। यह परंपरा मोक्ष की कामना को मजबूत करती है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से विवादास्पद बनी हुई है।​

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