ईरान की राजनीति के इतिहास में अली लारिजानी का नाम ऐसा है जो सिर्फ रक्षा या राजनीति का नहीं, बल्कि पूरी सत्ता‑संरचना को संतुलित करने वाले एक दूरदर्शी नेता के रूप में याद रखा जाएगा। मोजतबा खामेनेई के रास्ते में आने वाली आंतरिक चुनौतियों में लारिजानी की भूमिका सबसे ज्यादा गहरी और रणनीतिक थी।

वह ईरान की “वॉर‑मशीन” के तेजी से बढ़ते दबाव के बीच एक ऐसा चेहरा थे जो हल्के में नहीं लिये जा सकते थे; और अब उनकी मौत ने तेहरान के शक्ति‑योजना में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — कि आगे अब उस संतुलन की जगह कौन लेगा?

अली लारिजानी: ईरान के गुप्त संतुलनकार

अली लारिजानी को ईरान की राजनीति को समझने की कुंजी माना जाता है। वह उस थोड़े‑से गिने‑चुने ग्रुप में शामिल नेताओं में से थे जो न सिर्फ सेना और राजनेता के बीच ब्रिज बनते थे, बल्कि विदेश नीति और आंतरिक नियंत्रण दोनों क्षेत्रों में गहरी पकड़ रखते थे। लारिजानी का नाम इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति तक हर बड़े फैसले में जुड़ा हुआ था।

उनकी विशेषता यह थी कि वह न तो खुलेआम रूप से आलोचक थे और न ही बे‑सिर‑पैर समर्थक; बल्कि शक्ति‑संरचना के बीच एक गहरी रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में काम करते रहे। इसी वजह से उन्हें ईरान के “गुप्त संतुलनकार” (Power Balancer) के रूप में देखा जाता है — जो जरूरत पड़ने पर टक्कर‑प्रवण नेताओं को भी रोकने और नरम करने की कोशिश करते थे।

मोजतबा खामेनेई के विरोध में क्यों लारिजानी?

मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने के मामले में अली लारिजानी एक अहम विरोधी चेहरा थे। सूत्रों के अनुसार, वह युद्धकालीन माहौल में जल्दबाजी में लिए गए किसी भी फैसले से सावधान थे और उनका मानना था कि अगले सुप्रीम लीडर का चुनाव धीरे, विचार‑विमर्श के साथ होना चाहिए। इसी वजह से वह इस तरह की जल्दबाजी को रोकने की कोशिश करते हुए देखे गए।

लारिजानी का मानना था कि जल्दी टक्कर‑प्रवण नेतृत्व ईरान को बाहरी दबाव के चक्र में और गहरा फंसा सकता है। उनके लिए यह जरूरी था कि नया नेता ऐसा हो जो न केवल धार्मिक और राजनीतिक विश्वास रखता हो, बल्कि विदेश नीति में भी लचीलापन दिखा सके। मोजतबा के आक्रामक और टक्कर‑पर‑टक्कर की राजनीति के खिलाफ यही चिंता उनके विरोध का मुख्य आधार थी।

ईरान के पावर गेम में कितने ताकतवर थे लारिजानी?

उनकी ताकत सिर्फ पदों की सूची से नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक और सुरक्षा नेटवर्क से मापी जाती है। अली लारिजानी ने लंबे समय तक ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनयिक नीति में प्रमुख भूमिका निभाई, जिससे वह न सिर्फ तेहरान के तख्ते पर बल्कि रूस, चीन और अन्य समर्थक देशों के शीर्ष नेताओं के साथ भी सीधा तालमेल बना सकते थे। चीन‑ईरान सौदे जैसे बड़े आर्थिक‑राजनयिक फैसलों में भी उनकी आवाज़ सुनी जाती थी।

उनकी खास बात यह थी कि वह ई कट्टरपंथी और सुधारवादी दोनों धाराओं के बीच चल सकने वाले नेता थे। कट्टरपंथी समूह उनकी नेतृत्व‑क्षमता से डरते थे, क्योंकि वह उनकी अति‑आक्रामक नीतियों को रोक सकते थे; साथ ही सुधारवादी नेता भी उन्हें एक ऐसी उम्मीद मानते थे जो ईरान को बाहरी दबाव से बचाकर रख सकता है। इस तरह लारिजानी एक ऐसा ध्रुव बन गए थे जिसकी उपस्थिति या अनुपस्थिति ही ईरान की रणनीति तय कर सकती थी।

चुनाव और अयोग्यता के पीछे की कहानी

अली लारिजानी के राजनीतिक करियर में एक दिलचस्प मोड़ यह था कि उन्हें कई बार चुनाव लड़ने से रोका गया या अयोग्य घोषित कर दिया गया। सामान्य बाहरी व्याख्या में यह “नियम‑आधारित छंटनी” बताई जाती है, लेकिन आंतरिक सूत्र इसे राजनीतिक नियंत्रण और शक्ति‑संरचना का हिस्सा मानते हैं।

जब लारिजानी ने राष्ट्रपति या अन्य बड़े पद के लिए दावा पेश किया, तो उनके नामांकन के दौरान उनकी राजनीतिक और धार्मिक योग्यता पर सवाल खड़े किए गए। आधिकारिक रूप से यह बताया गया कि वे नियमों के अनुसार अयोग्य हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि असली वजह यह थी कि उनकी अलग‑अलग धाराओं में फैली लोकप्रियता और नेतृत्व‑क्षमता सत्ता‑केंद्र के लिए खतरा बन सकती थी। इस तरह उनकी “अयोग्यता” ईरान की शक्ति‑नाटक का एक धुंधला, लेकिन स्पष्ट चरण बन गई।

लारिजानी, रूहानी और अंदरूनी रणनीतिक गठबंधन

अली लारिजानी अकेले नहीं लड़ रहे थे; उनके साथ हसन रूहानी जैसे अन्य नेता भी मोजतबा के सुप्रीम लीडर बनने के रास्ते में रोड़े अड़ाने की कोशिश करते रहे। रूहानी के विचार‑समूह को ज्यादातर सुधारवादी और व्यावहारिक विदेश नीति की दिशा वाला माना जाता है, जबकि लारिजानी अधिक लचीले और रणनीतिक रुझान वाले नेता थे। दोनों ने मिलकर एक ऐसा दृष्टिकोण बनाया जो टकराव के बजाय संवाद और संतुलन की तरफ झुका हुआ था।

यह गठबंधन ईरान के अंदरूनी पावर गेम में एक गहरा ध्रुव बन गया था, जो न केवल मोजतबा के आक्रामक आंकलन के खिलाफ था, बल्कि सत्ता‑केंद्र के अंदर भी एक विकल्प के रूप में मौजूद था। उनकी ताकत इतनी थी कि अगर वे एकजुट रहते तो शक्ति‑संरचना को बदलने तक की संभावना थी। लेकिन अंततः यह अभियान नाकाम रहा, क्योंकि दूसरी तरफ भी बहुत ज्यादा मजबूत और गहरा नेटवर्क तैयार था, जो IRGC, धार्मिक विरासत और विदेश नीति में फैले तकाज़ों को जोड़कर चलता था।

इस रणनीतिक खिलाड़ियों के ग्रुप के सामने लारिजानी‑रूहानी गैंग चाहे कितनी भी चतुर नीति बनाता रहा, लेकिन अंतिम निर्णय‑सत्ता, जो ईरान में ख़ुदा के बाद ख़ुदा जैसे दावे वाली शक्ति के हाथ में रहती है, उसके खिलाफ खड़ा होना बहुत मुश्किल था। इसी वजह से धीरे‑धीरे उनका दबाव कम होता गया, उनकी आवाज़ सीमित होती गई और अंत में जब मोजतबा के सुप्रीम लीडर बनने का रास्ता साफ हो गया, तो वैसी चुनौती तक नहीं बची जो उन्हें रोक सके। लारिजानी की मौत ने इसी तूल‑संतुलन को पूरी तरह तोड़ दिया और ईरान को एक और अधिक आक्रामक और अंदरूनी विरोध‑रहित दौर में धकेल दिया।

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