हाल ही में जोमैटो के zomato ceo दीपिंदर गोयल ने गिग इकॉनमी के समर्थन में जो बयान दिए, उन्होंने एक बार फिर कॉरपोरेट दुनिया और आम मेहनतकश के बीच की खाई को उजागर कर दिया। उनकी दलीलों में आंकड़ों का सहारा जरूर लिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये आंकड़े ज़मीनी सच्चाई को पूरी तरह दर्शाते हैं?

गिग इकॉनमी: अवसर या असुरक्षा?

गिग इकॉनमी को अक्सर “लचीलापन” और “स्वतंत्रता” का प्रतीक बताया जाता है। कंपनियां दावा करती हैं कि डिलीवरी पार्टनर या फ्रीलांसर अपनी सुविधा से काम करते हैं और अच्छी कमाई कर सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इस मॉडल में काम करने वाले लाखों लोग न तो स्थायी आय की सुरक्षा पाते हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा जैसे बीमा, पेंशन या सवेतन अवकाश।

आंकड़ों का चयन और अधूरी तस्वीर

zomato ceo दीपिंदर गोयल द्वारा पेश किए गए आंकड़े औसत आय और चुनिंदा उदाहरणों पर आधारित हैं। औसत आय का आंकड़ा अक्सर उन कामगारों की स्थिति छुपा देता है जो बेहद कम कमाते हैं या जिनके लिए काम के घंटे लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कुछ सफल उदाहरणों को सामने रखकर पूरी व्यवस्था को सही ठहराना एकतरफा दृष्टिकोण को दर्शाता है।

जिम्मेदारी से बचती कॉरपोरेट भाषा

गिग वर्कर्स को “पार्टनर” कहने वाली कंपनियां जब जिम्मेदारी की बात आती है, तो खुद को सिर्फ एक “टेक प्लेटफॉर्म” बताने लगती हैं। दुर्घटना, बीमारी या आय में गिरावट की स्थिति में कामगार अकेला रह जाता है। प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम से काम, रेटिंग और बोनस तय करते हैं, लेकिन जवाबदेही लेने से बचते हैं।

लचीलापन या एल्गोरिदम की मजबूरी?

कागजों में काम की आज़ादी दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता में कामगार को पीक आवर्स में लॉग-इन रहना पड़ता है, ऑर्डर रिजेक्ट करने पर रेटिंग गिरती है और कम रेटिंग का मतलब कम काम। ऐसे में “स्वतंत्रता” एक भ्रम बनकर रह जाती है, जहां हर फैसला एल्गोरिदम तय करता है।

विशेषाधिकार बनाम जमीनी संघर्ष

कॉरपोरेट नेतृत्व जिस आर्थिक सुरक्षा, संसाधन और स्थिरता के साथ गिग इकॉनमी को आंकता है, वही उसका विशेषाधिकार है। दूसरी ओर गिग वर्कर ईंधन खर्च, मोबाइल डेटा, स्वास्थ्य जोखिम और अनिश्चित भविष्य के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। इन दो अनुभवों के बीच की दूरी को केवल आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।

सुधार की जरूरत

गिग इकॉनमी को पूरी तरह नकारना समाधान नहीं है, लेकिन इसे आदर्श मॉडल के रूप में पेश करना भी खतरनाक है। न्यूनतम आय की गारंटी, सामाजिक सुरक्षा, पारदर्शी एल्गोरिदम और कामगारों की भागीदारी के बिना यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।
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