सर्जरी के बाद जुबान बदल गई! युवक होश में आया तो फर्राटेदार स्पेनिश बोलने लगा – फॉरेन लैंग्वेज सिंड्रोम का रहस्य

स्टीफन चेज फुटबॉल खेलते समय घुटने में चोटिल हो गए थे। अमेरिका के यूटा राज्य के एक अस्पताल में उनकी घुटने की सर्जरी निर्धारित की गई। सर्जरी सामान्य रूप से सफल रही, लेकिन जब स्टीफन को होश आया, तो रिकवरी रूम में नर्सों ने उनसे सामान्य सवाल पूछे—जैसे दर्द कैसा है या नाम क्या है। जवाब में स्टीफन ने स्पेनिश में धाराप्रवाह बोलना शुरू कर दिया।

नर्सें हैरान रह गईं क्योंकि स्टीफन का मूल भाषा अंग्रेजी थी। वह स्पेनिश की बेसिक जानकारी तो रखते थे—स्कूल में थोड़ा सीखा था—लेकिन कभी फर्राटेदार तरीके से बात नहीं कर पाए थे। यह स्थिति लगभग 20 से 60 मिनट तक चली, जिसमें स्टीफन को अंग्रेजी बोलने में कठिनाई हुई। वह उलझन में पड़ जाते थे जब कोशिश करते।
डॉक्टरों ने तुरंत जांच शुरू की। मस्तिष्क की स्कैनिंग और न्यूरोलॉजिकल टेस्ट से पता चला कि यह कोई स्थायी क्षति नहीं थी। स्टीफन धीरे-धीरे सामान्य हो गए, लेकिन यह अनुभव उनके और डॉक्टरों के लिए चौंकाने वाला था। स्टीफन ने बाद में मीडिया को बताया, “मैं खुद हैरान था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा दिमाग किसी और की भाषा पर स्विच हो गया हो।” इस घटना ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया, जहां लाखों लोगों ने वीडियो शेयर किया।
फॉरेन लैंग्वेज सिंड्रोम क्या है?
फॉरेन लैंग्वेज सिंड्रोम (Foreign Language Syndrome) एक बेहद दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल स्थिति है। यह आमतौर पर स्ट्रोक, ब्रेन इंजरी, माइग्रेन या कभी-कभी एनेस्थीसिया के साइड इफेक्ट से होता है। इसमें व्यक्ति अचानक अपनी मातृभाषा भूल जाता है और किसी विदेशी भाषा में बोलने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह दिमाग के ब्रोका एरिया (भाषा उत्पादन केंद्र) और वर्निके एरिया (भाषा समझ केंद्र) में अस्थायी गड़बड़ी से होता है। एनेस्थीसिया दवाएं दिमाग के न्यूरॉन्स को प्रभावित करती हैं, जिससे छिपी हुई यादें या सीखी हुई भाषाएं सक्रिय हो जाती हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि बचपन में सुनी या आधी-अधूरी सीखी भाषाएं दिमाग के डीप लेयर्स में स्टोर रहती हैं। सर्जरी के तनाव या दवाओं से ये सक्रिय हो जाती हैं। स्टीफन के मामले में स्पेनिश इसलिए उभरा क्योंकि उन्होंने बचपन में स्पेनिश बोलने वाले दोस्तों या टीवी से इसे सुना था। यह सिंड्रोम स्थायी नहीं होता—ज्यादातर केसों में 24-48 घंटों में ठीक हो जाता है। दुनिया भर में अब तक 100 से कम मामले दर्ज हुए हैं।
यह भी पढ़ें:https://thedbnews.in/xs-big-crackdown-on-pornographic-content-600-accounts-deleted/
स्टीफन के साथ दोबारा घटना
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि स्टीफन के साथ यह सिर्फ एक बार नहीं हुआ। अगली सर्जरी से पहले उन्होंने डॉक्टरों को चेतावनी दे दी—”पिछली बार ऐसा ही हुआ था, फिर स्पेनिश बोलने लगा था।” फिर भी, होश आने पर वही समस्या दोहराई गई। स्टीफन ने हंसते हुए कहा, “अब तो मैं सर्जरी से डरने लगा हूं, लेकिन स्पेनिश सीखना तो मुफ्त मिल गया!” डॉक्टरों ने उन्हें रिलैक्स करने की सलाह दी और एनेस्थीसिया डोज कम किया। इस बार स्थिति जल्दी सामान्य हुई। यह घटना दर्शाती है कि कुछ लोगों में यह पैटर्न दोहरा सकता है।
वैज्ञानिक और चिकित्सकीय नजरिया
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जॉन स्मिथ (काल्पनिक नाम, सामान्य विशेषज्ञता पर आधारित) के अनुसार, “एनेस्थीसिया दिमाग को ‘रीबूट’ मोड में डाल देता है। कभी-कभी पुरानी मेमोरीज फ्लैशबैक की तरह आ जाती हैं।” अध्ययनों में पाया गया कि 1% सर्जरी पेशेंट्स में भाषा संबंधी अस्थायी बदलाव होते हैं। ब्रेन स्कैन (fMRI) से पता चलता है कि भाषा केंद्रों के बीच क्रॉस-वायरिंग हो जाती है। उपचार में स्पीच थेरेपी और समय लगता है। स्टीफन के डॉक्टरों ने सुझाव दिया कि भविष्य में लोकल एनेस्थीसिया इस्तेमाल करें।
यह सिंड्रोम स्ट्रोक पीड़ितों में ज्यादा देखा जाता है। उदाहरणस्वरूप, 2010 में एक ब्रिटिश महिला स्ट्रोक के बाद चीनी बोलने लगी थी, जबकि कभी सीखा नहीं था। ऐसे केस दिमाग के रहस्यों को उजागर करते हैं।
अन्य समान मामले दुनिया भर में
स्टीफन का केस अकेला नहीं है। नीदरलैंड्स में एक 17 वर्षीय लड़के ने घुटने की सर्जरी के बाद डच भूलकर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना शुरू कर दिया। उसके माता-पिता हैरान थे क्योंकि घर में सिर्फ डच बोली जाती थी। भारत में भी ऐसे केस सुने गए हैं—2024 में एक मुंबई के मरीज ने सर्जरी के बाद तमिल बोलना शुरू किया, जबकि मूल भाषा मराठी थी।
रूस में एक महिला स्ट्रोक के बाद पोलिश बोलने लगी। अमेरिका में 2023 का एक केस जहां मरीज ने जर्मन सीख लिया। ये सभी फॉरेन लैंग्वेज सिंड्रोम के उदाहरण हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबलाइजेशन से भाषा एक्सपोजर बढ़ने से ऐसे केस बढ़ सकते हैं। सोशल मीडिया ने इन्हें वायरल बना दिया, जिससे जागरूकता बढ़ी।
दिमाग के रहस्य और संभावित कारण
इंसानी दिमाग सबसे जटिल अंग है—100 बिलियन न्यूरॉन्स से बना। भाषा सीखना इसमें सब्स्टेंशिया नियाग्रा जैसा होता है। बचपन की भाषाएं हिप्पोकैंपस में लॉन्ग-टर्म मेमोरी के रूप में स्टोर रहती हैं। एनेस्थीसिया (जैसे प्रोपोफोल) GABA रिसेप्टर्स को प्रभावित करता है, जिससे इनहिबिशन कम हो जाता है। नतीजा—छिपी भाषा बाहर आ जाती है।
शोधकर्ता कहते हैं कि यह ‘क्रिप्टिक मेमोरी एक्टिवेशन’ है। MRI स्टडीज से पता चला कि भाषा क्षेत्रों का ओवरलैप हो जाता है। जेनेटिक फैक्टर भी भूमिका निभा सकते हैं। स्टीफन केस ने न्यूरोसाइंटिस्ट्स को नई रिसर्च के लिए प्रेरित किया।
मरीजों के लिए सलाह और सावधानियां
ऐसे लक्षण दिखने पर घबराएं नहीं। डॉक्टरों को तुरंत बताएं। ज्यादातर केस खुद ठीक हो जाते हैं। स्पीच थेरेपी मदद करती है। सर्जरी से पहले भाषा इतिहास बताएं। लोकल एनेस्थीसिया सुरक्षित विकल्प है। मरीजों को मनोवैज्ञानिक सपोर्ट दें, क्योंकि इससे डर लग सकता है।
सोशल मीडिया पर वायरल रिएक्शन
यह खबर ट्विटर, इंस्टाग्राम पर ट्रेंड कर रही है। लोग कमेंट कर रहे—”दिमाग का कमाल!” या “भाषा सीखने का नया तरीका।” मीम्स बन रहे हैं। स्टीफन ने खुद वीडियो शेयर किया, जो 10 लाख व्यूज पार कर गया। यह न्यूरोलॉजी को पॉपुलर बना रहा है।
निष्कर्ष: विज्ञान और चमत्कार का मेल
स्टीफन का केस साबित करता है कि दिमाग अनंत संभावनाओं का खजाना है। सर्जरी जैसे रूटीन प्रोसीजर भी आश्चर्यचकित कर सकते हैं। यह जागरूकता बढ़ाता है कि चिकित्सा में हर मरीज यूनिक है। भविष्य में इससे बेहतर एनेस्थीसिया विकसित हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें:https://thedbnews.in/icc-silence-leaves-bcb-stunned-confusion-over-t20-world-cup-2026/ sports

