अहमदाबाद में 82 साल के एक बुजुर्ग के साथ हुआ साइबर फ्रॉड पूरे देश के लिए एक बड़ा अलर्ट बनकर सामने आया है। वरिष्ठ नागरिक को ऑनलाइन ठगों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर तीन हफ्ते तक तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा और इस दौरान उनसे 7 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा ली।

जब तक मामला पुलिस तक पहुंचा, तब तक करोड़ों रुपये ठगों के हत्थे चढ़ चुके थे और पुलिस सिर्फ लगभग 10 लाख रुपये की रकम को ही रोक पाने में सफल हो सकी।

कैसे शुरू हुआ धोखा: एक फोन कॉल से बदली जिंदगी

यह पूरा खेल एक फोन कॉल से शुरू हुआ, जब 82 साल के बुजुर्ग के मोबाइल पर खुद को CBI और मुंबई क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताने वाले एक शख्स का कॉल आया। कॉलर ने बुजुर्ग का आधार नंबर, नाम और अन्य निजी जानकारी बताकर उनका विश्वास जीतने की कोशिश की और फिर उन पर गंभीर आरोप मढ़ दिए कि उनके आधार से जुड़े मोबाइल और अकाउंट का इस्तेमाल अश्लील वीडियो सेलिब्रिटीज और अन्य लोगों को भेजने में किया गया है।
कॉलर ने बुजुर्ग को यह डर भी दिखाया कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग, साइबर पोर्नोग्राफी और संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन जैसे मामले दर्ज हो सकते हैं। इतनी उम्र में पुलिस-केस और बदनामी का डर बुजुर्ग पर हावी हो गया और उन्होंने आगे की बात सुनने के लिए खुद को तैयार कर लिया।

फर्जी अफसर, नकली आईडी और ऑनलाइन कोर्ट रूम का ड्रामा

फोन पर बातचीत आगे बढ़ी तो ठगों ने कॉल को एक वॉयस कॉन्फ्रेंस और बाद में वीडियो कॉल में बदल दिया, जिसमें अलग-अलग लोग खुद को CBI, मुंबई पुलिस, RBI, इंटरपोल और ED के अधिकारी बताकर सामने आने लगे। स्क्रीन पर उन्होंने नकली आईडी कार्ड, ऑफिस बैकग्राउंड और लोगो दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की कि मामला बेहद गंभीर है और उच्चस्तरीय जांच चल रही है।
ठगों ने बुजुर्ग के सामने एक नकली “ऑनलाइन कोर्ट” का नाटक भी किया, जिसमें कथित जज, सरकारी वकील और जांच अधिकारी वीडियो कॉल पर मौजूद दिखाए गए। बुजुर्ग से व्हाट्सऐप और ईमेल के माध्यम से कई हलफनामे, स्पष्टीकरण और बयान लिखवाए गए। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि अगर वे पूरी तरह सहयोग करेंगे, “जांच” क्लीन निकलने पर न सिर्फ उनका नाम साफ हो जाएगा, बल्कि उनके सारे पैसे भी सुरक्षित वापस कर दिए जाएंगे।

डिजिटल अरेस्ट क्या है: घर में बैठे-बैठे कैद

ठगों ने बुजुर्ग को यह कहते हुए मानसिक रूप से जकड़ लिया कि अभी उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” में रखा जा रहा है। उन्हें समझाया गया कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, वे घर से बाहर नहीं जा सकते, किसी रिश्तेदार, मित्र या बैंक अधिकारी से इस मामले में बात नहीं कर सकते और 24 घंटे मोबाइल व इंटरनेट के माध्यम से एजेंसी की निगरानी में रहेंगे।
बुजुर्ग को हिदायत दी गई कि वे मोबाइल की लोकेशन हमेशा ऑन रखें, व्हाट्सऐप और वीडियो कॉल पर उपलब्ध रहें और बिना पूछे कोई भी कदम न उठाएं। इस तरह तीन हफ्ते तक उन्हें मानसिक रूप से इस तरह बांधकर रखा गया कि वे खुद को सचमुच किसी कानूनी गिरफ्त में मानने लगे।
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बैंक खातों, निवेश और प्रॉपर्टी की डीटेल पर हाथ

जांच के नाम पर ठगों ने सबसे पहले बुजुर्ग से उनकी पूरी फाइनेंशियल प्रोफाइल निकलवाई। कौन-कौन से बैंक अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट, डिमैट अकाउंट, म्यूचुअल फंड, प्रॉपर्टी और अन्य निवेश उनके नाम पर हैं, यह सब विस्तार से पूछकर नोट किया गया। उनकी ईमेल, SMS और नेट बैंकिंग की डीटेल्स मांगी गईं, ताकि आगे के ट्रांजेक्शन को वे खुद मॉनिटर कर सकें।
ठगों ने बुजुर्ग से कहा कि “जांच” के लिए एक “नोडल सेफ अकाउंट” में उनके फंड्स ट्रांसफर करने होंगे, ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि रकम किसी अवैध स्रोत से नहीं आई। बुजुर्ग से कहा गया कि अगर वे सहयोग नहीं करेंगे तो उन पर तुरंत गिरफ्तारी, पासपोर्ट जब्ती और संपत्ति कुर्की जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

7 करोड़ से ज्यादा की रकम ऐसे साफ हुई

इसके बाद अगले कई दिनों तक बुजुर्ग से लगातार ट्रांजेक्शन कराए गए। उन्हें कहा गया कि HDFC और SBI जैसे प्रमुख बैंकों में मौजूद उनके खातों से रकम निकालकर Axis Bank, Yes Bank और अन्य निजी बैंकों के अलग-अलग खातों में RTGS, NEFT और चेक के माध्यम से भेजी जाए।
हर ट्रांजेक्शन से पहले उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता कि यह पैसा RBI और ED के मॉनिटरिंग अकाउंट्स में जा रहा है, जहां इसकी जांच की जाएगी और बाद में पूरी राशि उन्हें वापस कर दी जाएगी। उम्र, डर और लगातार मानसिक दबाव के चलते बुजुर्ग हर निर्देश का पालन करते गए।
करीब 10 दिनों की अवधि में उन्होंने किस्तों में कुल 7 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम ट्रांसफर कर दी। हर बार उन्हें कथित “जांच अधिकारी” स्क्रीनशॉट, फर्जी मेमो और दस्तावेज दिखाकर यह यकीन दिलाते रहे कि सब कुछ प्रोटोकॉल के तहत हो रहा है और वे निर्दोष साबित हो जाएंगे।

झांसा टूटने पर दर्ज हुई शिकायत, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी

कई हफ्ते बीतने के बाद भी जब न तो कोई लिखित क्लीन चिट मिली और न ही रकम लौटाने की कोई आधिकारिक सूचना आई, तब बुजुर्ग को शक होना शुरू हुआ। कुछ डॉक्यूमेंट्स की लैंग्वेज, फॉन्ट और ईमेल आईडी उन्हें संदिग्ध लगने लगे।
आखिरकार, परिवार के एक सदस्य से बात होते-होते उन्होंने मामले की झलक साझा की, जिसके बाद हकीकत का अंदाजा हुआ। परिजनों ने तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल कर शिकायत दर्ज कराई और अहमदाबाद साइबर क्राइम पुलिस के पास आवेदन दिया। तब यह खुलासा हुआ कि जिन अकाउंट्स में पैसा भेजा गया, वे वास्तविक सरकारी या जांच एजेंसियों के नहीं, बल्कि साइबर क्रिमिनल्स के म्यूल अकाउंट्स थे।

पुलिस की कार्रवाई: सिर्फ 10 लाख रुपये ही फ्रीज हो सके

शिकायत मिलते ही साइबर पुलिस ने उन सभी बैंक खातों को ट्रैक करने की कोशिश की, जिनमें बुजुर्ग से रकम ट्रांसफर कराई गई थी। बैंकों को इमरजेंसी मेल और नोटिस भेजकर ट्रांजेक्शन फ्रीज करने का प्रयास किया गया, लेकिन तब तक ज्यादातर रकम या तो कैश के रूप में निकाली जा चुकी थी या अन्य खातों और डिजिटल वॉलेट में रूट कर दी गई थी।
पुलिस और बैंकों की तेजी के बावजूद लगभग 7 करोड़ से ज्यादा की ठगी में से केवल करीब 10 लाख रुपये जैसी मामूली रकम ही होल्ड की जा सकी। बाकी रकम की ट्रेल अलग-अलग राज्यों और संभवतः विदेशों तक जाती दिख रही है, जिसकी जांच जारी है। यह पूरा केस दिखाता है कि साइबर ठग कितनी तेज़ी से पैसे को कई चैनलों में घुमा देते हैं, ताकि रिकवरी मुश्किल हो जाए।

डिजिटल अरेस्ट स्कैम का बढ़ता नेटवर्क

डिजिटल अरेस्ट स्कैम कुछ सालों से भारत में तेजी से उभरता हुआ नया साइबर फ्रॉड मॉडल है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI, ED, कस्टम्स, RBI या अन्य एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को कानूनी केस के नाम पर फंसा रहे हैं। आम तौर पर पीड़ितों से कहा जाता है कि उन पर मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स तस्करी, पोर्नोग्राफी या हवाला से जुड़े केस दर्ज हैं और उनकी कॉल, पैकेट या बैंक अकाउंट किसी अपराध से लिंक पाए गए हैं।
इस तरह के मामलों में ज्यादातर टारगेट ऐसे लोग होते हैं जो या तो बुजुर्ग हैं, अकेले रहते हैं या सिस्टम से डरते हैं। उन्हें बदनामी, गिरफ्तारी और जेल की धमकी देकर इतना डरा दिया जाता है कि वे बिना परिवार या वकील से सलाह लिए ठगों के हर निर्देश का पालन करने लगते हैं।

कैसे बचें डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से

ऐसे मामलों से सबक लेते हुए साइबर विशेषज्ञ और पुलिस कुछ अहम सावधानियां अपनाने की सलाह देते हैं:

  • कोई भी सरकारी एजेंसी व्हाट्सऐप कॉल, टेलीग्राम, सामान्य मोबाइल नंबर या वीडियो कॉल के जरिए किसी को गिरफ्तार या “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करती।
  • अगर कोई खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI या किसी भी एजेंसी का अधिकारी बताकर धमकाए, तो तुरंत कॉल काटें और संबंधित विभाग के आधिकारिक नंबर या वेबसाइट पर दिए गए हेल्पलाइन से वेरिफाई करें।
  • कभी भी OTP, UPI PIN, नेट बैंकिंग पासवर्ड, कार्ड नंबर, CVV या पूरे बैंक स्टेटमेंट किसी अनजान नंबर या लिंक के जरिए साझा न करें, चाहे सामने वाला खुद को कितना भी बड़ा अधिकारी बताए।
  • अगर कोई अचानक आपके अकाउंट से पैसे “जांच” या “सुरक्षा” के नाम पर कहीं ट्रांसफर करने को कहे, तो बिना देरी किए परिवार, भरोसेमंद मित्र या वकील से सलाह लें और तुरंत नजदीकी साइबर थाने या 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करें।
  • बैंक से जुड़े हर बड़े ट्रांजेक्शन पर अलर्ट सेट रखें और अपने बुजुर्ग परिजनों को भी इस तरह के स्कैम के बारे में पहले से जागरूक करें, ताकि वे तुरंत पहचान सकें।
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