भारत जैसे विकासशील देश के लिए शिक्षा केवल एक सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति, सामाजिक समानता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की नींव है। हर वर्ष केंद्रीय बजट के समय शिक्षा क्षेत्र को लेकर उम्मीदें बढ़ जाती हैं।

इसी संदर्भ में द हिंदू द्वारा 24 जनवरी 2026 को आयोजित वेबिनार “Budget: Time for a massive boost to education?” ने यह सवाल उठाया कि क्या अब शिक्षा को वास्तव में बड़े स्तर पर वित्तीय और नीतिगत समर्थन देने का समय आ गया है?

इस चर्चा में देश के विभिन्न शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया और शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों तथा भविष्य की जरूरतों पर विस्तार से विचार रखे।

वेबिनार की पृष्ठभूमि

यह वेबिनार ऐसे समय में आयोजित हुआ जब देश नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने की प्रक्रिया में है और डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास, उच्च शिक्षा में शोध तथा शिक्षकों की गुणवत्ता जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में बने हुए हैं।

इस कार्यक्रम के पैनल में शामिल थे:

  • टिकेंद्र सिंह पंवार – पूर्व उपमहापौर, शिमला नगर निगम
  • अभिषेक मल्होत्रा – सहायक प्रोफेसर, श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • प्रो. विश्वनाथन अय्यर – वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफेसर, ग्रेट लेक्स, चेन्नई

कार्यक्रम का संचालन किया एम. कल्याणरमन ने, जो द हिंदू में शिक्षा क्षेत्र का नेतृत्व करते हैं।

शिक्षा पर खर्च: वर्तमान स्थिति

भारत का शिक्षा पर सरकारी खर्च लंबे समय से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 3–4% के आसपास रहा है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे 6% तक बढ़ाने की सिफारिश की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • स्कूलों की आधारभूत संरचना अब भी कई क्षेत्रों में कमजोर है
  • सरकारी विश्वविद्यालयों में रिसर्च फंडिंग अपर्याप्त है
  • शिक्षकों की ट्रेनिंग और वेतन में सुधार की जरूरत है
  • डिजिटल डिवाइड अब भी बड़ी समस्या बनी हुई है

इन्हीं मुद्दों पर वेबिनार में गंभीर चर्चा हुई।

टिकेंद्र सिंह पंवार का दृष्टिकोण: जमीनी हकीकत

पूर्व उपमहापौर टिकेंद्र सिंह पंवार ने कहा कि बजट बनाते समय केवल बड़े शहरों और प्रतिष्ठित संस्थानों को ध्यान में रखना पर्याप्त नहीं है।

उनके अनुसार:

“ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूलों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कई जगहों पर शिक्षक नहीं हैं, भवन जर्जर हैं और इंटरनेट कनेक्टिविटी नाम मात्र की है।”

उन्होंने सुझाव दिया कि बजट में:

  • ग्रामीण स्कूलों के लिए अलग फंड
  • स्थानीय भाषाओं में डिजिटल कंटेंट
  • शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण
  • छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं

को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

अभिषेक मल्होत्रा: उच्च शिक्षा और रोजगार की खाई

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अभिषेक मल्होत्रा ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार के बीच बढ़ती खाई पर चिंता जताई।

उनका मानना था कि:

“हम बड़ी संख्या में स्नातक तैयार कर रहे हैं, लेकिन उनमें से कई उद्योग की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं होते।”

उन्होंने कहा कि बजट में इन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

  • इंडस्ट्री-अकादमिक साझेदारी
  • स्किल-बेस्ड कोर्स
  • स्टार्टअप और इनोवेशन लैब
  • इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम

इससे छात्रों को पढ़ाई के साथ व्यावहारिक अनुभव मिलेगा और बेरोजगारी की समस्या भी कम होगी।

प्रो. विश्वनाथन अय्यर: शोध और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

ग्रेट लेक्स, चेन्नई के प्रो. विश्वनाथन अय्यर ने भारत की उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा:

“विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालय रिसर्च और इनोवेशन पर भारी निवेश करते हैं। भारत में अभी भी शोध को द्वितीय श्रेणी का विषय माना जाता है।”

उनके सुझाव:

  • विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र रिसर्च फंड
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग
  • पीएचडी और पोस्ट-डॉक्टरल स्कॉलरशिप
  • अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं

यदि भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनना है, तो शिक्षा बजट का बड़ा हिस्सा अनुसंधान और नवाचार को मिलना चाहिए।

डिजिटल शिक्षा: अवसर और चुनौतियां

कोविड महामारी के बाद डिजिटल शिक्षा तेजी से बढ़ी, लेकिन इसके साथ असमानताएं भी सामने आईं।

वेबिनार में इस पर चर्चा करते हुए बताया गया कि:

अवसर:

  • दूरदराज के छात्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • ऑनलाइन कोर्स और वर्चुअल लैब
  • शिक्षकों का राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण

चुनौतियां:

  • इंटरनेट और उपकरणों की कमी
  • भाषा संबंधी बाधाएं
  • शिक्षकों की तकनीकी दक्षता
  • साइबर सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि बजट में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग से बड़ा प्रावधान होना चाहिए।

स्कूली शिक्षा: नींव मजबूत करने की जरूरत

यदि स्कूली शिक्षा कमजोर होगी, तो उच्च शिक्षा अपने आप प्रभावित होगी। इसलिए बजट में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मुख्य जरूरतें:

  • स्मार्ट क्लासरूम
  • शिक्षकों की भर्ती
  • मिड-डे मील और पोषण योजनाएं
  • लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष योजनाएं
  • ड्रॉपआउट दर कम करने के उपाय

शिक्षा और सामाजिक समानता

शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।

वेबिनार में वक्ताओं ने कहा कि:

  • आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग
  • ग्रामीण समुदाय
  • अनुसूचित जाति/जनजाति
  • दिव्यांग छात्र

इन सभी के लिए बजट में लक्षित योजनाएं जरूरी हैं।

बजट 2026 से क्या उम्मीदें?

चर्चा के आधार पर शिक्षा विशेषज्ञों की प्रमुख अपेक्षाएं इस प्रकार रहीं:

  1. शिक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि
  2. GDP का कम से कम 6% शिक्षा को
  3. रिसर्च और इनोवेशन को प्राथमिकता
  4. डिजिटल शिक्षा में निवेश
  5. शिक्षकों के लिए बेहतर वेतन और प्रशिक्षण
  6. रोजगार उन्मुख पाठ्यक्रम

सरकार के लिए बड़ी चुनौती

सरकार के सामने कई चुनौतियां हैं:

  • सीमित संसाधन
  • रक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर भी खर्च
  • आर्थिक विकास बनाए रखना

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा पर खर्च को खर्च नहीं, निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्यों जरूरी है “Massive Boost”?

“Massive boost” का अर्थ केवल अधिक पैसा देना नहीं है, बल्कि:

  • बेहतर नीतियां
  • पारदर्शी फंड वितरण
  • परिणाम आधारित मूल्यांकन
  • दीर्घकालिक योजना

यदि शिक्षा प्रणाली मजबूत होगी, तो:

  • कुशल कार्यबल तैयार होगा
  • स्टार्टअप और उद्योग बढ़ेंगे
  • सामाजिक असमानता घटेगी
  • लोकतंत्र मजबूत होगा

द हिंदू द्वारा आयोजित यह वेबिनार एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ गया:

क्या भारत वास्तव में शिक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाने के लिए तैयार है?

यदि बजट 2026 में शिक्षा को बड़ा प्रोत्साहन मिलता है, तो यह देश के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। शिक्षा में निवेश केवल आज के छात्रों के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करेगा।
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