वेनेजुएला की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो ने हाल ही में कहा कि वह आज़ाद वेनेजुएला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी करने के लिए तैयार हैं और भारत को अपने देश के लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण में एक प्रमुख भागीदार मानती हैं ।

मचाडो के बयान के मुख्य बिंदु

  • मचाडो ने कहा कि उनके देश की जनता लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही है और इसमें भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है ।
  • उन्होंने बताया कि “हम भारतीय जनता पर भरोसा कर सकते हैं, जो वेनेजुएला में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक बदलाव में हमारा साथ देंगी।”
  • मचाडो ने अपने संघर्ष को “आजादी की अंतिम मंज़िल के बेहद करीब” बताया और कहा कि उनकी सरकार भारतीय और अमेरिकी लोकतंत्रों से प्रेरणा लेती है ।
  • उन्होंने यह भी दोहराया कि “आज हमारे सबसे बड़े सहयोगी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिनके समर्थन से वेनेजुएला तानाशाही से लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा।”

नोबेल सम्मान पर उनकी प्रतिक्रिया

मारिया कोरीना मचाडो को 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला में लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण बदलाव के लिए लंबे संघर्ष के कारण मिला ।
उन्होंने यह पुरस्कार वेनेजुएला की जनता और राष्ट्रपति ट्रंप को समर्पित करते हुए कहा कि “यह समर्पण उन सभी के साहस और दृढ़ता की पहचान है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ी।”

इस तरह, मचाडो का पूरा संदेश भारत और लोकतांत्रिक देशों के प्रति आभार और साझेदारी की भावना को दर्शाता है। उन्होंने संकेत दिए कि स्वतंत्र वेनेजुएला में वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित मित्र देशों के नेताओं का स्वागत करना चाहेंगी ।

मचाडो के नोबेल पुरस्कार पर भारत की प्रतिक्रिया कैसी रही

मारिया कोरीना मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर भारत की प्रतिक्रिया संतुलित और स्वागतयोग्य रही। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे “लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की जीत” बताया, वहीं भारत के कई राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों ने इस सम्मान को लैटिन अमेरिका में लोकतंत्र की दिशा में एक आशा की किरण कहा ।​​

सरकारी प्रतिक्रिया

भारत सरकार की ओर से आधिकारिक बयान में कहा गया कि मचाडो का सम्मान “वेनेजुएला में लोकतंत्र के लिए संघर्षरत सभी लोगों के साहस को पहचानने वाला निर्णय” है । विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह भी जोड़ा कि मचाडो का अहिंसक संघर्ष “महात्मा गांधी के सिद्धांतों की याद दिलाता है” और भारत हमेशा वैश्विक लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ खड़ा है ।​

मीडिया और विशेषज्ञ प्रतिक्रिया

  • भारतीय मीडिया ने मचाडो के इस पुरस्‍कार को ट्रंप और मादुरो के बीच तनावपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि में एक “राजनयिक संकेत” बताया।
  • ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट में कहा गया कि यह फैसला नॉर्वे की नोबेल समिति का “साहसिक कदम” है, जिसने वैश्विक राजनीतिक दबावों के बावजूद लोकतांत्रिक संघर्ष को प्राथमिकता दी ।​
  • विदेश नीति विशेषज्ञों ने माना कि मचाडो द्वारा भारत और प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा भारत-वेनेजुएला संबंधों को मजबूती दे सकती है, खासकर ऊर्जा और बुनियादी ढांचा सहयोग के क्षेत्र में ।

भारतीय जनभावना

सोशल मीडिया पर भारतीय उपयोगकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर मचाडो को बधाई दी। कई पोस्ट में उनके भारत प्रेम और महात्मा गांधी का ज़िक्र करने को सकारात्मक रूप से सराहा गया। हिंदी समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी इस खबर को “लोकतंत्र की जीत” कहकर व्यापक कवरेज दी गई ।

कुल मिलाकर, भारत की प्रतिक्रिया न केवल मचाडो के सम्मान के प्रति हर्षपूर्ण थी, बल्कि इसे उन मूल्यों के पुनर्स्मरण के रूप में देखा गया जिन पर भारतीय लोकतंत्र टिका है — शांति, स्वतंत्रता और अहिंसक राजनीतिक परिवर्तन।

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