दिल्ली और एनसीआर की हवा पिछले दो महीनों से लगातार खराब बनी हुई है। राहत के कुछ दिन छोड़ दें तो राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ज़्यादातर समय ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में दर्ज हुआ। सवाल यह उठता है कि कड़े नियमों और GRAP के चरणबद्ध लागू होने के बावजूद दिल्ली में हालात क्यों नहीं संभल पा रहे हैं?

हवा में जहर की बढ़ती परतें

अक्टूबर से दिसंबर तक दिल्ली की हवा में सूक्ष्म कण (PM 2.5 और PM 10) खतरनाक स्तर पर बने हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौसमीय बदलाव, ठंड की शुरुआत और हवा की गति में कमी के चलते प्रदूषक तत्व ज़मीन के पास फंस जाते हैं। इस दौरान दिल्ली की औसत AQI कई दिनों तक 350 से 450 के बीच दर्ज की गई — जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक मानी जाती है।

GRAP के स्तर लागू होते रहे, असर घटता गया

प्रदूषण के हालात बिगड़ने पर दिल्ली में GRAP के सभी चार चरणों को बार-बार लागू किया गया। इनमें कंस्ट्रक्शन रोक से लेकर डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध जैसी सख्त पाबंदियां शामिल थीं।
फिर भी माहौल में सुधार नहीं हुआ। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, GRAP लागू होने के बाद भी प्रदूषण घटने के बजाय अक्सर अगले हफ्ते बढ़ा हुआ दर्ज हुआ।

स्थानीय कारण बड़े दोषी

विशेषज्ञ मानते हैं कि GRAP भले ही ठोस कदम है, लेकिन स्थानीय और अस्थायी कारणों से स्थिति बेकाबू बनी हुई है। सड़कों की धूल, ट्रैफिक जाम, रिहायशी इलाकों में कचरा जलाने की घटनाएं और औद्योगिक उत्सर्जन इस प्रदूषण संकट को बढ़ा रहे हैं। साथ ही पंजाब और हरियाणा में पराली जलने की घटनाएं भी स्थिति को और गंभीर बना देती हैं।

सरकारी जंग और जनता की जिम्मेदारी

दिल्ली सरकार और पर्यावरण मंत्रालय लगातार प्रदूषण कम करने के लिए उपायों का दावा कर रहे हैं — जैसे ऑड-ईवन योजना, एंटी-स्मॉग गन, और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सरकार नहीं, जनता की जागरूकता भी इस जंग की कुंजी है। व्यक्ति स्तर पर वाहन उपयोग घटाना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना और कचरा जलाने की आदत पर रोक जैसे छोटे कदम बड़ा असर डाल सकते हैं।

आगे क्या?

मौसम के ठंडा होते ही अगले कुछ हफ्तों तक हालत और खराब हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि संवेदनशील वर्ग — बुजुर्ग, बच्चे और अस्थमा के मरीज — बाहर निकलने से बचें और घरों में एयर प्यूरिफायर या N95 मास्क का उपयोग करें।
फिलहाल यह साफ है कि दिल्ली की हवा को सांस लेने योग्य बनाने के लिए सख्त नीति, सटीक क्रियान्वयन और सामूहिक जिम्मेदारी — तीनों की जरूरत है।

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