अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ खेल में भारत ने चुपचाप अपना गेम बदल दिया और बड़ी चाल चलते हुए चीन को होने वाले अपने एक्सपोर्ट में इस साल 22% की बढ़ोतरी हासिल कर ली है।

टैरिफ तकरार में भारत की चाल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारत के सामानों पर सीधा असर डाला और अगस्त 2025 से अमेरिकी टैरिफ 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का रास्ता मुश्किल हो गया, खासतौर पर झींगा, एल्यूमिनियम, टेक्सटाइल जैसे सेक्टर पर दबाव आया।

एक्सपोर्ट बढ़ाकर चीन में नई मार्केट बनाई

लेकिन भारत ने तेजी से अपनी रणनीति बदली—इन सेक्टरों में चीन की मांग को भांपते हुए निर्यात बढ़ाया। अप्रैल-सितंबर 2025 में भारत का चीन को एक्सपोर्ट 8.41 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 6.90 अरब डॉलर था—यानी 22% ग्रोथ। चीनी राजदूत ने खुद सोशल मीडिया पर कहा कि “बीजिंग भारतीय सामानों का स्वागत करता है और US टैरिफ का असर कम करने में मदद के लिए तैयार है”।

वैश्विक व्यापार में भारत की मजबूत होती स्थिति

अमेरिका-चीन टैरिफ वार ने पूरी दुनिया की ट्रेड नीतियों को हिला दिया, लेकिन भारत ने संकट को अवसर में बदलते हुए चीन सहित अन्य देशों में अपनी पकड़ बढ़ाई। इससे न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिली, बल्कि ग्लोबल मार्केट में एक नए खिलाड़ी की तरह भारत की पैठ भी मजबूत हुई है।

एक नजर: एक्सपोर्ट ग्रोथ का मुकाबला

अवधिचीन को भारत का निर्यातप्रतिशत वृद्धि
अप्रैल-सितंबर 20246.90 अरब डॉलर
अप्रैल-सितंबर 20258.41 अरब डॉलर22%

इस तरह, ट्रंप के टैरिफ-टैरिफ के शोर के बीच भारत ने चुपचाप मार्केट में अपना दम दिखाया, और चीन के साथ नए व्यापार अवसरों को मजबूती दी।

​भारत-चीन व्यापार वृद्धि से भारत को कई आर्थिक लाभ मिल रहे हैं, लेकिन इसके अपने जोखिम और चुनौतियां भी हैं।

लाभ

  • दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ने से भारत को तकनीकी उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर पैनल, रसायन, और औद्योगिक कच्चा माल सस्ते दामों पर मिलता है, जिससे देश के मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को मजबूती मिलती है।
  • सीमा व्यापार फिर शुरू होने से सालाना 5-6 अरब डॉलर अतिरिक्त लाभ अनुमानित है, जिससे अमेरिकी टैरिफ के नुकसान की भरपाई हो सकती है।
  • सहयोग बढ़ने से भारत को चीनी निवेश, लाइफ साइंसेज, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और ऑटोमोबाइल सेक्टर में ग्रोथ के नए अवसर मिलते हैं।

जोखिम

  • भारत-चीन व्यापार में अब भी चीन का दबदबा है—भारत का ट्रेड डेफिसिट 2024-25 में करीब 99 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, यानी भारत चीन से खरीदता ज्यादा है और बेचता कम।
  • कमजोर सप्लाई चेन डाइवर्सिटी के कारण चीन पर अधिक निर्भरता भारत के लिए जोखिम है; तनाव या पाबंदी लगने पर घरेलू उद्योगों को झटका लग सकता है।
  • गैर-टैरिफ बैरियर्स, क्वालिटी कंट्रोल स्टैंडर्ड और चीनी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को ग्लोबल मार्केट में चुनौती मिलती है।
  • चीनी निवेश और तकनीकी कंपनियों की भारत में सक्रियता से डेटा सिक्योरिटी व रणनीतिक जोखिम भी उत्पन्न होते हैं।

निष्कर्ष

भारत-चीन व्यापारिक वृद्धि के चलते जहां भारत को सस्ते औद्योगिक इनपुट, निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का लाभ मिल सकता है, वहीं यदि ट्रेड बैलेंस और डिपेंडेंसी को नहीं साधा गया, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालीन चुनौती बन सकता है। संतुलित, सुरक्षित और आत्मनिर्भर व्यापार मॉडल भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता है।

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