हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित ज्वाला देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ बिना तेल, घी या बाती के नौ प्राकृतिक ज्वालाएँ सदियों से जल रही हैं। इस अखंड ज्योति का रहस्य विज्ञान और इतिहास दोनों के लिए आज भी अनसुलझी पहेली है, जिसने लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचा। मुगल सम्राट अकबर से लेकर आम यात्रियों तक, सभी इस चमत्कार की गवाही देते हैं।\

ज्वाला देवी मंदिर: शक्तिपीठ की ऐतिहासिक पहचान

ज्वाला देवी मंदिर, जिसे श्री ज्वालामुखी मंदिर भी कहा जाता है, कालीधार पहाड़ी के बीच 850 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ देवी सती की जीभ के गिरने की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि अग्नि देवी के रूप में देवी ज्वालामुखी की मूर्ति नहीं, बल्कि नौ ज्वालाएँ ही उनका स्वरूप हैं।

मंदिर का इतिहास और निर्माण

माना जाता है कि इस मंदिर का मूल निर्माण राजा भूमि चंद ने कराया था, बाद में पांडवों ने पुनर्निर्माण किया। वर्तमान संरचना कई मरम्मतों के बाद बनी है, जिसमें चारों कोनों पर छोटे गुंबद और केंद्र में एक बड़ा गुंबद है। गर्भगृह में पत्थर की चट्टान है, जहाँ से नौ ज्वालाएँ निकलती हैं। बारहवीं शताब्दी के पास यह स्थान कांगड़ा के राजाओं के लिए महत्वपूर्ण था।

मुगल सम्राट अकबर ने यहाँ आकर ज्योति को बुझाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे। इसके बाद उन्होंने देवी को स्वर्ण छत्र अर्पित किया, जो आज भी यहाँ चढ़ावे के रूप में देखा जा सकता है।


अखंड ज्योति: बिना बाती के जलती लौ का रहस्य

मंदिर का सबसे विशिष्ट अंग नौ प्राकृतिक ज्योतियाँ हैं, जो चट्टानों से निकलकर चौबीसों घंटे जलती रहती हैं। इनमें सबसे बड़ी “महाकाली” नाम से जानी जाती है। भक्तों के अनुसार, यह अखंड ज्योति देवी की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है, जो कभी नहीं बुझती।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या कहता है?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ज्वालाएँ प्राकृतिक रूप से निकलने वाली मीथेन या अन्य गैसों से जल रही हैं, जो भूकंपीय गतिविधियों या गर्म ग्लास से जुड़ी हैं। इन गैसों का स्रोत अभी तक पूरी तरह नहीं ज्ञात है, इसलिए रहस्य बना हुआ है। कुछ शोधों में यह निष्कर्ष निकाला गया कि ज्वाला देवी जैसे स्थल विज्ञान और धर्म के मिलन के उदाहरण हैं।

भक्त मानते हैं कि कोई भी मानवीय प्रयास इस अग्नि को नष्ट नहीं कर सका, जो देवी की शक्ति का सबूत है।

धार्मिक महत्व और यात्रा गाइड

ज्वाला देवी मंदिर नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान विशेष महत्व रखता है, जब लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि ज्वालाएँ ही देवी का रूप हैं।

कैसे पहुँचें ज्वाला देवी मंदिर?

  • नजदीकी एयरपोर्ट: कांगड़ा (25 किमी) या धर्मशाला (50 किमी) से टैक्सी या बस।

  • रेलवे: पठानकोट या कांगड़ा स्टेशन से 20-25 किमी की दूरी।

  • रोड यात्रा: दिल्ली से 450 किमी, चंडीगढ़ से 250 किमी।

  • सबसे अच्छा समय: अप्रैल-जून या सितंबर-नवंबर, जब मौसम शांत और दर्शन आसान हो।

यात्रा टिप्स और आसपास के जगहें

  • सुबह-शाम आरती में भाग लें, जो खास आकर्षण है।

  • पास में चामुंडा नंदी देवी मंदिर और अन्य शक्तिपीठ भी घूमें।

  • किसी वैसे स्थान पर जाएँ, जहाँ यात्रा बीमारी या कोल्ड की चेतावनी हो।

रोचक तथ्य और चमत्कार की कहानियाँ

ज्वाला देवी मंदिर के बारे में कई रोचक कहानियाँ प्रचलित हैं। अकबर के अलावा, अन्य शासकों ने भी इस ज्योति को बुझाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। यह दर्शाता है कि यह स्थान आस्था और विज्ञान के बीच अद्वितीय संतुलन का प्रतीक है।

क्यों है यह स्थान खास?

  • भारत के सबसे रहस्यमयी शक्तिपीठों में से एक।

  • दुनिया भर से यात्री इस चमत्कार के दर्शन के लिए आते हैं।

  • ज्योति देखकर श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएँ पूरी मानते हैं।

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