नोएडा फेक कॉल सेंटर: फर्जी इंश्योरेंस ठगी, पुलिस छापा

नोएडा पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए ऐसे फेक कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया है जो लंबे समय से लोगों को फर्जी इंश्योरेंस पॉलिसियों के नाम पर ठग रहा था। यह गिरोह सेक्टर-63 के एक ऑफिस से काम कर रहा था और खुद को बड़े-बड़े बीमा कंपनियों का प्रतिनिधि बताकर लोगों से लाखों रुपये ऐंठ चुका था। पुलिस ने मौके से कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया है और बड़ी मात्रा में मोबाइल फोन, लैपटॉप, सिम कार्ड और पॉलिसी दस्तावेज बरामद किए हैं।

अधिकारियों के मुताबिक, यह गिरोह पिछले कई महीनों से सक्रिय था। इसके निशाने पर मुख्य रूप से वे लोग होते थे जिनकी इंश्योरेंस पॉलिसी की अवधि पूरी होने वाली होती थी। पुलिस का कहना है कि अब तक सैकड़ों लोगों से ठगी की शिकायतें सामने आ चुकी हैं और नुकसान की कुल राशि लाखों में बताई जा रही है।
ठगी का तरीका: बोनस और रिन्यूअल के नाम पर झांसा
पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि यह कॉल सेंटर एक बेहद सटीक प्लानिंग के तहत चलाया जा रहा था। कॉल सेंटर में प्रशिक्षित कॉलिंग एजेंटों की टीम काम करती थी जो ग्राहकों को प्रोफेशनल तरीके से कॉल करती थी। वे खुद को नामी बीमा कंपनी जैसे LIC, HDFC, या ICICI Prudential का अधिकारी बताते थे।
ठग लोगों को बताते कि उनकी इंश्योरेंस पॉलिसी खत्म होने वाली है और उसे रिन्यू करने पर उन्हें भारी बोनस या रिटर्न मिलेगा। इसी बहाने वे उनसे कुछ “प्रोसेसिंग चार्ज” या “रिन्यूअल फीस” के नाम पर पैसा मांगते और फर्जी लिंक या वेबसाइट के जरिए पेमेंट करवा लेते।
कुछ मामलों में वे ग्राहकों को ईमेल पर फर्जी पॉलिसी डॉक्यूमेंट भी भेजते थे ताकि पीड़ित को असली दिखे। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, ठग हर कॉल पर औसतन 5,000 से 20,000 रुपये तक वसूलते थे और रोजाना 50 से 100 लोगों से संपर्क करते थे।
पुलिस की कार्रवाई: मुखबिर की सूचना से हुआ खुलासा
डीसीपी (नोएडा सेंट्रल) अंकुर अग्रवाल ने बताया कि पुलिस को एक मुखबिर से इस फेक कॉल सेंटर के बारे में जानकारी मिली थी। इसके बाद पुलिस टीम ने इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और ग्राउंड जांच शुरू की।
टीम ने जैसे ही लोकेशन की पुष्टि की, एक विशेष अभियान चलाकर कॉल सेंटर पर छापा मारा। मौके से करीब 15 युवक-युवतियों को हिरासत में लिया गया। सभी कॉलिंग एजेंट थे जिन्हें महीने की सेलरी और इंसेंटिव के बदले ग्राहकों को कॉल करने का काम सौंपा गया था।
पुलिस ने उनके पास से 20 मोबाइल फोन, 15 लैपटॉप, कई एक्टिव सिम कार्ड, रजिस्टर और बैंक अकाउंट से जुड़े डिटेल्स जब्त किए हैं। प्राथमिक पूछताछ में पता चला कि गिरोह का मास्टरमाइंड दिल्ली से काम कर रहा था और नोएडा का कॉल सेंटर उसकी शाखा के रूप में चल रहा था।
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मास्टरमाइंड की तलाश जारी
पुलिस ने बताया कि गिरोह का सरगना अभी फरार है। उसकी पहचान कर ली गई है और टीम उसकी लोकेशन खोज रही है। जांचकर्ताओं का कहना है कि मास्टरमाइंड ने कई अन्य शहरों में भी ऐसे फेक कॉल सेंटर खोल रखे थे।
हर जगह पर वह लोकल युवाओं को काम पर रखकर ठगी कराता था। कॉलर एजेंट हर सफल ठगी पर कमीशन पाते थे। पुलिस इन कॉल सेंटरों के नेटवर्क को तोड़ने के लिए तकनीकी जांच कर रही है।
कुछ पीड़ितों की कहानी: मिनटों में लुटे हजारों
इस फर्जीवाड़े का शिकार बने कई लोगों ने बताया कि उन्हें कॉल आया जिसमें कहा गया कि उनकी पॉलिसी पर “बोनस क्लेम” या “परफॉर्मेंस बेनिफिट” बकाया है। कॉलर ने बड़े विश्वास के साथ बाकायदा पॉलिसी नंबर और अन्य डिटेल भी बताई, जिससे लोगों को लगा कि कॉल असली है।
दिल्ली निवासी एक पीड़ित ने बताया कि उसने लिंक के जरिए 12,000 रुपये भेज दिए लेकिन बाद में जब बीमा कंपनी से जांच की तो पता चला कि ऐसा कोई ऑफर ही नहीं था। इसी तरह नोएडा की एक महिला ने 9,500 रुपये जमा किए और बाद में पता चला कि उनकी पॉलिसी नकली नाम से दर्ज हो गई थी।
पुलिस की चेतावनी: सतर्क रहें, अनजान कॉल पर न करें भरोसा
नोएडा पुलिस ने सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिए लोगों को सतर्क रहने की अपील की है। पुलिस का कहना है कि अगर किसी अनजान नंबर से कॉल आए और कोई व्यक्ति खुद को बीमा कंपनी का प्रतिनिधि बताए, तो तुरंत कंपनी की आधिकारिक हेल्पलाइन पर इसकी पुष्टि करें।
साथ ही, अगर कोई लिंक या वेबसाइट पेमेंट के लिए भेजी जाए, तो उसे बिना जांचे क्लिक न करें। साइबर ठग अक्सर असली वेबसाइट जैसी ही नकली साइट बनाते हैं, जिससे लोग भ्रमित हो जाते हैं।
पुलिस ने यह भी बताया कि किसी भी कंपनी का असली एजेंट कभी ग्राहकों से UPI या QR कोड के जरिए पेमेंट नहीं मांगता। ग्राहक हमेशा कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या ब्रांच के ज़रिए ही भुगतान करें।
साइबर ठगी के बढ़ते मामले
पिछले कुछ वर्षों में साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़े हैं। खासकर इंश्योरेंस और बैंकिंग सेक्टर में फर्जी कॉल और फेक वेबसाइट्स के ज़रिए लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत में साल 2025 में करीब 2 लाख से अधिक साइबर फ्रॉड केस दर्ज किए गए जिनमें से बड़ी संख्या इंश्योरेंस ठगी से जुड़ी थी।
नोएडा, गुरुग्राम, मुंबई और पुणे जैसे मेट्रो शहर ठगों के लिए पसंदीदा जगह बन चुके हैं क्योंकि यहां कॉल सेंटर कल्चर मजबूत है और ऐसी जगहों पर युवाओं को नौकरी देकर ठगी कराना आसान होता है।
गिरोह का नेटवर्क और तरीका
पुलिस जांच में जो मॉडल सामने आया, वह काफी संगठित है। गिरोह का मास्टरमाइंड दिल्ली में बैठकर डाटा माइनिंग और फेक वेबसाइट डेवलपमेंट करवाता था। दूसरी तरफ, कॉल सेंटर एजेंटों को टार्गेट नंबर दिए जाते थे।
इन नंबरों पर दिनभर कॉल किए जाते और लगातार नए स्क्रिप्ट तैयार की जाती थीं ताकि ग्राहक को असली कंपनी का कर्मचारी समझा जा सके। ठग अक्सर फर्जी “कस्टमर आईडी”, “पॉलिसी कोड” या “रिफरेंस नंबर” का इस्तेमाल करते थे ताकि भरोसेमंद लगें।
ठगी के पीछे तकनीकी जाल
पुलिस ने पाया कि ठगों ने क्लाउड टेलीफोनी सर्विस का इस्तेमाल किया, जिससे उनके नंबर आसानी से ट्रैक नहीं किए जा सकते थे। इसके अलावा, उन्होंने फर्जी वेबसाइट्स और पेमेंट गेटवे भी बनाए जो असली बीमा कंपनियों के डिजाइन से हूबहू मिलते-जुलते थे।
ठग हर कॉल रिकॉर्ड करते थे और जिन ग्राहकों ने पेमेंट कर दिया, उनकी डिटेल को एक अलग लिस्ट में डाल दिया जाता था ताकि भविष्य में फिर से ‘बोनस क्लेम’ के नाम पर ठगा जा सके।
आगे की जांच और संभावित गिरफ्तारी
पुलिस अब गिरोह के बैंक खातों और मनी ट्रेल की जांच कर रही है। साइबर सेल को भी मामले में जोड़ा गया है ताकि डिजिटल ट्रांजेक्शन्स का पता लगाया जा सके।
जांच में यह भी पता चला है कि गिरोह ने पिछले छह महीनों में 50 से अधिक नकली बैंक खाते और UPI IDs का उपयोग किया था। बैंकिंग टूल्स की मदद से वे रकम तुरंत दूसरे अकाउंट्स में ट्रांसफर करके निकाल लेते थे।
जनता के लिए सुझाव
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी तरह के वित्तीय कॉल पर तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए। हमेशा कंपनी की वेबसाइट या कस्टमर केयर से संपर्क कर पुष्टि करें। किसी भी अनजान लिंक, QR कोड या अज्ञात व्यक्ति के कहने पर UPI पेमेंट न करें।
इसके अलावा, अगर कोई ठगी की कोशिश करता है तो तुरंत स्थानीय थाने या साइबर क्राइम पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर शिकायत दर्ज कराएं। समय पर कार्रवाई से ऐसे गिरोहों पर लगाम लगाई जा सकती है।
नतीजा: ठगों पर शिकंजा, लेकिन सावधानी सबसे बड़ा हथियार
नोएडा पुलिस की इस कार्रवाई के बाद कई लोगों ने राहत की सांस ली है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक डिजिटल सतर्कता नहीं बढ़ती, ऐसे फर्जीवाड़े पूरी तरह नहीं रुक सकते।
डिजिटल युग में ठगी का तरीका भी तकनीकी होता जा रहा है। इसलिए जरूरी है कि हर नागरिक जागरूक रहे, वित्तीय जानकारी साझा करने से पहले पूरी जांच करे, और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत रिपोर्ट करे।
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