ऑपरेशन सिंदूर पर पाक पीएम का झूठा भाषण, ट्रंप का करते रहे गुणगान

शहबाज शरीफ ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की डरावनी रातों का जिक्र किया और कहा, “क्या पता कौन जिंदा रहता…”। यह बयान गाजा शांति शिखर सम्मेलन के दौरान आया, जहां शरीफ ने बार-बार ट्रंप को भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम का श्रेय दिया और उन्हें ‘शांति का प्रतीक’ बताया। उन्होंने ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग भी दोहराई।

ऑपरेशन सिंदूर और शहबाज शरीफ का बयान
- ऑपरेशन सिंदूर भारत द्वारा मई 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद चलाया गया था, जिसमें 26 पर्यटक मारे गए थे। भारत ने इस कार्रवाई के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए थे।
- पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का कहना था कि उस रात पाकिस्तान पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा था और उन्होंने ट्रंप की कोशिशों के चलते ही संघर्षविराम स्वीकार किया। उनके बयान में ऑपरेशन सिंदूर के डर और तबाही का असर साफ दिखा।
- संयुक्त राष्ट्र और व्हाइट हाउस में दिए गए बयानों में शहबाज ने बार-बार ट्रंप की भूमिका पर जोर दिया, जबकि भारत ने हमेशा तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से इनकार किया है।
ट्रंप की भूमिका और भारत का जवाब
- डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को इस संघर्षविराम का मुख्य सूत्रधार बताया, लेकिन भारत ने साफ कहा है कि यह सीजफायर पाकिस्तान की खुद की दरख्वास्त पर हुआ और इसमें किसी तीसरे देश की कोई दखल नहीं थी।
- पाकिस्तान ने ट्रंप की तारीफ में कसीदे पढ़े, जबकि भारत ने इसे पाकिस्तानी राजनीति का ‘डर’ और अपने देश में आंतरिक दबाव से जुड़ा बताया।
चर्चा और मीडिया में प्रतिक्रिया
- पाकिस्तान के अंदरूनी मीडिया और कुछ विश्लेषकों ने भी माना कि ट्रंप को खुश करने के लिए इस तरह की बातें की गईं। पाकिस्तानी पत्रकारों के मुताबिक, शहबाज शरीफ की कूटनीति इस समय ‘चापलूसी’ पर केंद्रित है।
इस तरह शहबाज शरीफ ने डोनाल्ड ट्रंप के सामने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की रातों का डर साझा कर भारत से संघर्षविराम को अमेरिकी दबाव का नतीजा बताया, जबकि भारत ने हर स्तर पर इस दावे को खारिज किया है।
ट्रंप ने स्वयं ऑपरेशन पर क्या कहा
डोनाल्ड ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई बार दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को रोकने में उनकी निर्णायक भूमिका रही। ट्रंप ने खुले मंचों पर कहा, “मैंने पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध को रोका। दोनों देशों के प्रमुखों से बात की और उनके रिश्ते सुधारे। दोनों देश न्यूक्लियर पावर्स हैं, लेकिन मैंने इसे रोक दिया।”
- ट्रंप ने कहा कि उन्होंने व्यापार और टैरिफ (शुल्क) के दबाव के ज़रिए भारत को संघर्ष रोकने पर मजबूर किया और कई बार ये दावा दोहराया।
- उन्होंने कहा, “अगर मैं कुछ मदद कर सकता हूं, तो हमेशा तैयार हूं। मैं दोनों को बहुत अच्छे से जानता हूं और चाहता हूं कि वे युद्ध न करें।”
- ट्रंप का दावा रहा कि वे तीसरे पक्ष के तौर पर दोनों को बातचीत के लिए राज़ी कर सके।
हालांकि, भारत ने हर स्तर पर ट्रंप के दावे को पूरी तरह खारिज किया है और कहा कि भारत ने आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन किसी भी दबाव में नहीं रोका, बल्कि पाकिस्तान की दर्खास्त पर सैन्य स्तर की बातचीत के बाद सीजफायर हुआ।
शहबाज के बयान का राजनीतिक असर
शहबाज शरीफ ने ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप की भूमिका को खुले मंच पर सराहा और समझौते को ट्रंप की “शांति पहचानेवाले” छवि से जोड़ दिया, जिससे पाकिस्तान के भीतर और भारत-पाक संबंधों में कई तरह के राजनीतिक असर देखने को मिल रहे हैं।
पाकिस्तान के अंदरूनी हालात
- शरीफ के इस बयान से पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी और सेना को राहत मिली, क्योंकि इससे वे अपने लोगों को दिखा सके कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में संघर्षविराम हुआ और उनके नेतृत्व ने देश को बड़े नुक़सान से बचा लिया।
- लेकिन विपक्ष व कट्टरपंथी धड़ों ने इसकी आलोचना की कि शहबाज सरकार भारतीय हमलों का सैन्य जवाब देने में असफल रही और इंटरनेशनल मंच पर कमजोर दिखी।
- सेना और सरकार ने इसे एक कूटनीतिक जीत बताया, जबकि विरोधी इसे कमजोरी और ट्रंप की “चापलूसी” के तौर पर पेश करते हैं।
भारत-पाक रिश्ते पर प्रभाव
- भारत ने शहबाज के बयान और ट्रंप की मध्यस्थता के दावे को “बेतुकी नाटकीयता” कहा, साथ ही तीसरे पक्ष की भूमिका को पूरी तरह नकार दिया।
- भारतीय मीडिया और अधिकारियों ने इसे पाकिस्तान की आंतरिक मजबूरी और अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश बताया।
- इससे भारत-पाकिस्तान संबंधों में तात्कालिक तनाव कम तो हुआ, लेकिन स्थायी विश्वास या राजनीतिक समाधान आगे नहीं बढ़ा।
अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण
- ट्रंप का बार-बार ‘शांति सेदूत’ के तौर पर प्रस्तुत किया जाना पाकिस्तानी नेतृत्व वाले मंचों पर भले लोकप्रिय हो, लेकिन भारत और कई पश्चिमी विश्लेषकों ने इसे दिखावटी और कूटनीतिक बयानबाज़ी ही माना।
- पाकिस्तान के राजनीतिक हलकों में शहबाज शरीफ की रणनीति को “अस्थायी राहत” और लंबे समय के लिए “दोहरी छवि” के रूप में देखा जा रहा है।
सारांश: शहबाज के बयान का तत्काल असर पाकिस्तान के भीतर सरकार की मजबूती और विपक्षी आलोचना के रूप में दिखा है, जबकि भारत ने इसे पूरी तरह खारिज किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सिर्फ कूटनीतिक बयानबाज़ी के तौर पर ही देखा गया।

