कानपुर के एक निजी स्कूल से ऐसा मामला सामने आया जिसने अभिभावकों के दिलों में डर बैठा दिया है। 8 साल का मासूम बच्चा नींद में बार-बार बड़बड़ाने लगा — “मैम… मैंने पेन नहीं चुराया…”। पहले तो घरवाले इसे सामान्य समझते रहे, लेकिन जब बात बार-बार दोहराई जाने लगी तो मां-बाप को कुछ गड़बड़ लगा। इसके बाद जो सच्चाई सामने आई, उसने सबको हैरान कर दिया।

मां-बाप को हुआ शक, बच्चे ने बताई पूरी कहानी

बच्चे के पिता ने बताया कि कुछ दिनों से वह स्कूल जाने से डरने लगा था। जब उन्होंने वजह पूछी तो बच्चा चुप हो जाता और रोने लगता। एक दिन रात में नींद में उसके मुंह से वही बातें सुनकर उन्होंने धीरे-धीरे सच जानने की कोशिश की। आखिरकार बच्चे ने बताया कि उसकी मैम ने झूठे आरोप में उसे सबके सामने डांटकर पीटा।

उसने कहा, “मैंने पेन नहीं चुराया था, लेकिन मैम ने मुझसे पूरी क्लास के सामने खड़ा रखा और थप्पड़ मारे।” इस बात को सुनकर माता-पिता का दिल दहल गया। वे अगले ही दिन स्कूल पहुंचे और शिक्षिका से बात करने की कोशिश की।

शिक्षिका और स्कूल प्रशासन ने दिखाई लापरवाही

परिजनों के अनुसार, जब उन्होंने स्कूल प्रबंधन से शिकायत की तो वहां से टालमटोल वाला जवाब मिला। शिक्षिका ने पहले तो आरोपों से इनकार किया, लेकिन बाद में कहा कि उन्होंने “अनुशासन सिखाने के लिए” बच्चे को सजा दी थी। इस पर अभिभावकों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

स्कूल प्रशासन ने इस मामले में आंतरिक जांच की बात कही है, लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। माता-पिता अब चाहते हैं कि कानूनी रूप से शिक्षिका पर कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में किसी और बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार न हो।

बच्चे की मानसिक हालत बिगड़ी, अब इलाज चल रहा है

मनोवैज्ञानिक जांच में सामने आया कि टॉर्चर की वजह से बच्चा डर और असुरक्षा महसूस करने लगा है। डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चे में भय, आत्मविश्वास की कमी, और सामाजिक दूरी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल परिवार ने मनोरोग विशेषज्ञ की सलाह पर उसका इलाज शुरू कर दिया है।

एक विशेषज्ञ ने बताया कि “इस उम्र में होने वाला डर और अपमान बच्चों के अवचेतन मन में गहराई से बैठ जाता है। यह उनके व्यक्तित्व विकास को लंबे समय तक प्रभावित करता है।”

बढ़ते स्कूल टॉर्चर के मामलों ने बढ़ाई चिंता

कानपुर, लखनऊ, दिल्ली और कई अन्य शहरों में हाल के महीनों में स्कूलों में टॉर्चर और मानसिक शोषण के कई मामले सामने आए हैं। कई बार शिक्षकों का गुस्सा या अनुशासन लागू करने की गलत पद्धति बच्चों के लिए दर्दनाक बन जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि “शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में डर नहीं, जागरूकता और आत्मविश्वास पैदा करना है।” प्रशासन से अभिभावक मांग कर रहे हैं कि स्कूलों की मॉनिटरिंग सख्त हो, ताकि ऐसे शिक्षक दोबारा बच्चों पर हिंसा न कर सकें।

प्रशासन की सख्ती, लेकिन कार्रवाई अधूरी

जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा है कि मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई है। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, अब तक शिक्षिका या स्कूल प्रबंधन के खिलाफ किसी निलंबन या दंड की आधिकारिक सूचना नहीं है।

स्थानीय समाजसेवियों ने भी मामले में दखल दी है। “बच्चों का बचपन डर में नहीं, प्यार में गुजरना चाहिए,” — ऐसा कहना है बाल कल्याण समिति के सदस्य राजेश श्रीवास्तव का, जिन्होंने पीड़ित परिवार को कानूनी मदद देने की पेशकश की है।

सोशल मीडिया पर उठी आवाज, अभिभावकों ने की सख्त कार्रवाई की मांग

घटना सोशल मीडिया पर सुर्खियों में आने के बाद लोगों ने शिक्षिका के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। ट्विटर और फेसबुक पर हैशटैग #JusticeForKanpurChild ट्रेंड करने लगा। कई लोगों ने लिखा कि अगर बच्चा नींद में यह सब बोल रहा है, तो सोचिए टॉर्चर कितना गहरा रहा होगा।

स्कूलों को बनाना होगा सुरक्षित स्थान

यह घटना समाज के लिए चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्कूलों में शिक्षकों और स्टाफ की संवेदनशीलता पर भी नियमित निगरानी होनी चाहिए। टॉर्चर जैसी घटनाओं से न केवल बच्चे का भरोसा टूटता है, बल्कि शिक्षा की नींव भी हिल जाती है।

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