अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 अक्टूबर 2025 को वॉशिंगटन में पत्रकारों से बात करते हुए दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से आश्वासन दिया है कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। ट्रंप ने इसे रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के प्रयास का “बड़ा कदम” बताया और कहा कि अब वे चीन को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेंगे ।

ट्रंप ने कहा, “मैं खुश नहीं था कि भारत रूस से तेल खरीद रहा है, लेकिन आज पीएम मोदी ने मुझे भरोसा दिलाया है कि भारत अब ऐसा नहीं करेगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह निर्णय तत्काल लागू नहीं होगा क्योंकि इसमें “थोड़ी प्रक्रिया” लग सकती है ।

हालांकि, भारत सरकार या विदेश मंत्रालय की ओर से इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं की गई है । भारत वर्तमान में रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है, और सितंबर 2025 तक इसकी आयात मात्रा देश की कुल तेल जरूरतों का लगभग एक-तिहाई थी ।

इस बयान के पीछे अमेरिका का उद्देश्य रूस की तेल आमदनी को कम करके यूक्रेन युद्ध पर दबाव बनाना बताया जा रहा है । वहीं, ट्रंप प्रशासन ने हाल के महीनों में भारत पर 50% तक टैरिफ बढ़ाकर रूस से तेल खरीदारी को सीमित करने का दबाव भी बनाया था ।

सारांश रूप में, ट्रंप के अनुसार मोदी ने ऐसा आश्वासन दिया है, लेकिन भारतीय पक्ष से इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि या प्रतिक्रिया अभी नहीं आई है, इसलिए यह दावा फिलहाल एकतरफा बयान के रूप में देखा जा रहा है ।

भारत रूस से तेल खरीदने के पीछे क्या कारण हैं

भारत रूस से तेल खरीदने के पीछे मुख्य कारण सस्ते दाम और आर्थिक लाभ हैं। रूस ने पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद अपने तेल पर भारी छूट देना शुरू किया, जिससे भारतीय कंपनियों को रूस से सस्ता तेल खरीदने का मौका मिला। यह छूट प्रति बैरल $2 से $3 के बीच होती है, जो ब्रेंट क्रूड की तुलना में सस्ती पड़ती है।

इसके अलावा, रूस का तेल रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है क्योंकि इसका गहरा और सल्फर युक्त मिश्रण भारत की रिफाइनरी सिस्टम के अनुकूल होता है, जो खाड़ी देशों के तेल के समान है। इसलिए, भारतीय रिफाइनर इसे आसानी से प्रोसेस कर पाते हैं ।

अमेरिका द्वारा भारत पर रूसी तेल खरीद पर दबाव और टैरिफ लगाने के बावजूद, निजी क्षेत्र की बड़ी तेल कंपनियां जैसे रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई है, जबकि सरकारी रिफाइनरियों ने आयात कुछ हद तक कम किया है। भारत की कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 30-35% हिस्सा रूस से आता है ।

साथ ही, रूस से तेल खरीदने पर भारत को डॉलर आधारित भुगतान की बजाय चीनी युआन या रूबल जैसी वैकल्पिक मुद्राओं में भुगतान करने का विकल्प मिलता है, जो व्यापारियों के लिए सुविधाजनक है और डॉलर की निर्भरता कम करता है ।

इस प्रकार, भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद कीमतें, रिफाइनिंग अनुकूलता और भुगतान नियंत्रण के कारण रूस से तेल खरीद जारी है ।

मोदी सरकार की रूस से तेल खरीद में क्या बदलाव हो सकता है

मोदी सरकार की रूस से तेल खरीद में संभावित बदलाव पर फिलहाल कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से आश्वासन दिया है कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, लेकिन भारत सरकार ने इस दावे की कोई पुष्टि नहीं की है।

इस स्थिति में यह समझना जरूरी है कि रूस से तेल खरीदना लंबे समय वाले कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित होता है, इसलिए ऐसा निर्णय अचानक ना लिया जा सकेगा और बदलाव में समय लगेगा। भारत ने रूस से तेल खरीदना कम करने की बात कही है, लेकिन पूरी तरह से रोकने की आधिकारिक नीति अभी सामने नहीं आई है।

भारत पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीद जारी रख रहा है क्योंकि यह तेल भारत के लिए सस्ता पड़ता है और आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है। इसी कारण अमेरिकी टैरिफ (अतिरिक्त शुल्क) लगाकर भारत को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार ने इस क्षेत्र में अभी तत्काल कोई बड़े स्तर का बदलाव नहीं किया है।

संक्षेप में, मोदी सरकार रूस से तेल आयात में कुछ समय बाद बदलाव कर सकती है, लेकिन फिलहाल पूरी खरीद बंद करने की आधिकारिक नीति नहीं बनी है और इस मामले में द्विपक्षीय और वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक व आर्थिक पहलुओं का ध्यान रखा जा रहा है.

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