ओटीटी पर आई कप्तान एक ऐसी क्राइम-ड्रामा सीरीज है, जिसने रिलीज होते ही चर्चा बटोर ली है। ट्रेलर और शुरुआती प्रमोशन के बाद इसे लेकर यह धारणा बनी कि यह मिर्जापुर जैसी फील देने वाली सीरीज हो सकती है, लेकिन असली देखने के बाद तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। शो में देसी क्राइम वर्ल्ड, गैंगवार, पावर पॉलिटिक्स और पुलिस-गुंडा टकराव तो है, लेकिन थ्रिल और सस्पेंस का असर हर जगह बराबर नहीं टिकता।

ज्वालाबाद की क्राइम दुनिया

कप्तान की कहानी ज्वालाबाद के क्राइम वर्ल्ड के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां सत्ता, दबदबा और टकराव ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। सीरीज का माहौल साफ तौर पर उत्तर भारतीय बैकग्राउंड से प्रेरित है, जहां लोकल भाषा, देहाती टोन और आपसी दुश्मनी का रंग दिखाई देता है। इसी वजह से शो को देखते वक्त कई जगह मिर्जापुर और रंगबाज़ जैसी सीरीज की याद आती है।

लेकिन कहानी केवल उस टोन को पकड़ने तक सीमित नहीं रहती, उसे मजबूत बनाने के लिए जो लेखन और गहराई चाहिए, वह हर एपिसोड में बराबर नहीं मिलती। कुछ हिस्से असर छोड़ते हैं, तो कुछ हिस्से इतने अनुमानित लगते हैं कि उनका प्रभाव कम हो जाता है। यही वजह है कि सीरीज का सेटअप तो दमदार लगता है, लेकिन पकड़ कई जगह ढीली पड़ जाती है।

साकिब सलीम का असरदार काम

इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत साकिब सलीम की परफॉर्मेंस है। उन्होंने एसएसपी समरदीप के किरदार में गंभीरता, सख्ती और एक अंदरूनी उलझन को अच्छे से दिखाया है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस इस शो को कई जगह संभालता है और यही कारण है कि दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।

साकिब के किरदार की खासियत यह है कि वह खुद को हीरो साबित करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि अपने काम और व्यवहार से प्रभाव छोड़ता है। इसी नैचुरल अप्रोच की वजह से उनका रोल भरोसेमंद लगता है। अगर सीरीज में कोई चीज सबसे ज्यादा याद रह जाती है, तो वह साकिब सलीम की मौजूदगी है।

विलेन और सपोर्ट कास्ट

सीरीज में विरोधी किरदारों की मौजूदगी कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है, लेकिन कुछ रोल उतने पावरफुल नहीं बन पाए जितने होने चाहिए थे। कई बार ऐसा लगता है कि कलाकारों ने अपना काम ठीक से किया, मगर लेखन ने उन्हें उतनी मजबूती नहीं दी। यही कारण है कि जो टकराव बड़े स्केल का दिखना चाहिए था, वह कई जगह हल्का रह गया।

दूसरी तरफ, कविता कौशिक जैसे कलाकारों की मौजूदगी शो में ताजगी लाती है। पुलिस वाले किरदार में उनकी स्क्रीन पर वापसी ध्यान खींचती है। सिद्धार्थ निगम भी अपने हिस्से का काम ठीक से करते हैं, हालांकि उनके किरदार को और मजबूत लिखा जा सकता था।

क्यों कम पड़ता है थ्रिल

कप्तान का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसका थ्रिल है। क्राइम-ड्रामा शो से दर्शक जितना तनाव, चौंकाने वाले मोड़ और लगातार बढ़ती बेचैनी की उम्मीद करते हैं, वह हर जगह नहीं मिलती। कई जगह घटनाएं पहले से समझ में आने लगती हैं, जिससे सस्पेंस का असर कम हो जाता है।

सीरीज में एक्शन और गैंगवार के दृश्य जरूर हैं, लेकिन केवल हिंसा और टकराव किसी शो को यादगार नहीं बनाते। जब कहानी का ट्रीटमेंट और ट्विस्ट्स कमजोर हों, तो दर्शक जुड़ाव जल्दी खोने लगते हैं। कप्तान के साथ भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है।

मिर्जापुर वाली तुलना

रिलीज से पहले कप्तान को लेकर जो सबसे बड़ा सवाल बना, वह था कि क्या यह मिर्जापुर जैसी वाइब दे पाएगी। जवाब है कि कुछ हद तक दे तो पाती है, लेकिन मुकाबले की स्थिति तक नहीं पहुंचती। दोनों शोज के बीच तुलना स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों में देसी अपराध, सत्ता संघर्ष और हिंसा का स्वरूप दिखता है।

फिर भी मिर्जापुर ने जो सांस्कृतिक असर, डायलॉगबाजी और किरदारों की गहराई दी थी, कप्तान वहां तक नहीं पहुंचती। यह शो अपने स्तर पर एक साधारण से ऊपर की क्राइम ड्रामा बनती है, लेकिन कल्ट दर्जे की सीरीज बनने का वजन इसमें नहीं दिखता। मिर्जापुर जैसी चर्चा बनाने की कोशिश जरूर है, पर असर उतना तीखा नहीं है।

निर्देशन और प्रस्तुति

सीरीज का निर्देशन एक सघन माहौल बनाने की कोशिश करता है। बैकग्राउंड, रंग-रूप और लोकेल में लोकल टच देने की कोशिश साफ दिखाई देती है। कुछ दृश्यों में यह दुनिया विश्वसनीय भी लगती है, लेकिन पूरे शो में वही रफ्तार और वही कसाव बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।

एपिसोड्स की लंबाई और कहानी का फैलाव भी असर डालता है। 8 एपिसोड वाली इस सीरीज में कुछ हिस्से खिंचे हुए लगते हैं। अगर लेखन थोड़ा ज्यादा चुस्त होता, तो शो का प्रभाव और मजबूत हो सकता था।

किसे देखनी चाहिए

अगर आपको उत्तर भारतीय बैकड्रॉप वाली क्राइम-ड्रामा सीरीज पसंद हैं, तो कप्तान एक बार देखने लायक है। खासकर वे दर्शक, जिन्हें गैंगस्टर ड्रामा, पुलिस बनाम अपराधी टकराव और देसी भाषा वाला टोन पसंद आता है, वे इस शो से कुछ हद तक जुड़ सकते हैं। साकिब सलीम की परफॉर्मेंस भी देखने की बड़ी वजह बनती है।

लेकिन अगर आपकी उम्मीदें मिर्जापुर स्तर के इंटेंस थ्रिल, तेज मोड़ और गहरी writing की हैं, तो यह सीरीज उस पैमाने पर खरी नहीं उतरती। इसे ज्यादा से ज्यादा एक एक बार देखने लायक क्राइम ड्रामा कहा जा सकता है।

अंतिम राय

कप्तान एक ऐसा शो है जिसमें दमदार सेटअप, मजबूत लीड परफॉर्मेंस और देसी क्राइम वर्ल्ड का आकर्षण है। साकिब सलीम ने साबित किया है कि वह गंभीर किरदारों में अच्छा काम कर सकते हैं। कविता कौशिक और बाकी कलाकार भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

फिर भी शो की सबसे बड़ी कमी इसकी कमजोर थ्रिलिंग नैरेशन है। मिर्जापुर जैसी तुलना इसे नुकसान भी पहुंचाती है, क्योंकि वहां तक पहुंचने के लिए जितनी लेखकीय धार चाहिए, वह यहां कम पड़ती है। कुल मिलाकर, कप्तान में आग तो है, लेकिन वह पूरी तरह दहक नहीं पाती।

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